Sunday, December 15, 2013

मंजूर है !

सुलगती हूँ मैं
तो क्यूँ भर आती है
आँखें तुम्हारी ?
क्यों बैठे हो तुम
हवा और पानी पर
कुंडली मारे ?
या तो जीने लायक
मुझे हवा दे दो
या डाल दो
मुझपर पानी

मैंने प्यार किया है
सिर्फ तुमसे
इसलिए जलना भी
मंजूर है
बुझ जाना भी
मंजूर है
या फिर
तुम्हारी आँखों में
भरकर यूँ ही
सुलगते रहना
मंजूर है
मंजूर है
मंजूर है . 

Friday, February 8, 2013

जीवित शाहकार


ओ! पुरुष
हजारों-लाखों चीजों को
तुम जन्म देते रहो
लिखते रहो कविता
बनाते रहो मूर्तियाँ
और कभी ज्यादा खुश होकर
ताजमहल से भी ज्यादा
कोई महल बना दो
अपनी अपूर्णता को
पूर्ण करने के लिए
करते रहो निरंतर चेष्टा
और अनुभव करो
खुद में ही कि
तुम भी हो एक स्रष्टा
पर तुम्हारा सृजन झूठा
और तुम एक झूठे स्रष्टा
झूठी प्रसव-पीड़ा तुम्हारी
झूठी तृप्ति का दंभ
सच-सच बताओ कि
एक साधारण-सी स्त्री ही
क्या काफी नहीं है
तुम्हें मात देने के लिए
जो सौंपती है तुम्हें
जीवित शाहकार .

Sunday, December 30, 2012

फिर गलत क्या है ?


सबों की आँखें नम है
सब सबको अपनी संवेदना से
ऐसे अवगत करा रहे हैं की
मानो अभी-अभी वे ज़िंदा हुए हैं
साथ ही सब एक-दूसरे को
जलता हुआ देश बता भी रहे हैं
आखिर मैं भी तो
एक बलात्कार पीड़ित देश हूँ
हाँ! मुझे कहने में कोई भी
शर्म या डर नहीं है कि
मेरा भी हर पल ही
सामूहिक बलात्कार हो रहा है
तो मैं क्यों चुप रहूँ ?
मैं भी बोलूंगी, चीख कर बोलूंगी
जबकि सभी इस जलते हवन-कुंड में
सहानुभूति -आहुति झोंके जा रहे हैं
लपटें तो उठी हुई मालूम होती है
जलता हुआ आदम-गंध भी
फैलता हुआ मालूम होता है
साथ ही दिख रहा है कि
सब अपने नाक पर रुमाल डालें हैं
आहूत होने का उपक्रम कर रहे हैं
मैं भी शामिल हूँ उन्हीं में
पर कुंड तक मेरे हाथ नहीं पहुँच रहे हैं
जो कि सबके लिए अच्छा है
नहीं तो मगरमच्छ सिरे से विलुप्त हो जाते
इसलिए अपनी आहुति जताने के लिए
त्वरित मीडिया की मदद ले रही हूँ
नियम से वहां-वहां भी जाती हूँ
जहां चटका लगा कर अपनी
सहमति/उपस्थिति दर्ज करा आती हूँ
नारा लगाने वालों के पीछे भी
दुहराते हुए खड़ी हो जाती हूँ
थोडा-बहुत ही सही
आंसू गैस और पानी भी सह आती हूँ
कुछ गालियाँ भी दे आती हूँ
कुछ पत्थर भी चला आती हूँ
और हवा में जी भर के थूक भी आती हूँ
आखिर हर देश को
अपनी संवेदना दिखाना ही चाहिए
त्वरित प्रतिक्रया को भी बताना ही चाहिए
त्वरित कार्यवाही की मांग भी सही है
त्वरित न्याय होना भी सही है
आगे के लिए गारंटी भी सही है
सुरक्षा का वायदा भी सही है
सख्त कानून भी तो सही है
जब इतना कुछ सही है तो
फिर गलत क्या है ?


 

Friday, April 6, 2012

औकात


तुम्हारे भेदभाव पूर्ण नीतियों से
अविश्वास को मिल रहा है बढ़ावा
सवाल उठना तो लाजिमी है
पर तुम्हारी दमनकारी रवैया ने
सवाल को ही पीट-पीट कर
किया है लहुलुहान

फिर आरोपों की बौछार ने
संतुलन को किया है डाँवाडोल
उलटे परामर्श देते हो
रिश्ते को पारदर्शी बनाने का
और अपनी सोच में समीक्षा कर
बढ़ा लेते हो अपनी अपेक्षा

वैधानिक अधिकारों का हवाला देकर
अति कुशलता के सिद्धांतों को
लागू करते हो हम पर
साथ ही बड़ी ढिठाई से
हमें मुक्त करते हो सेवा कर से
तिस पर भी हमें उचित न ठहराना
तुम्हारी दीनता का ही प्रमाण है

तुम क्यों भूलते हो कि
गठजोड़ की राजनीति
समीकरणों से चलती है
मौजूदा हक़ीकत के हिसाब से
पल-पल बदलती है
और संवाद हीनता से बिगड़ती है
न कि अधिकारों को चुनौती देकर
या एकतरफा फैसला लेकर चलती है

एक बात तो साफ़ है
जिसे बस बताने की जरुरत है
कि विकास की अन्धी लहर ने
खोल दी है आँखें हमारी
अब दिन लद गये हैं
दबदबे वाली तुम्हारी

ऐसी बात ना ही करो
जिससे बिगड़े कोई भी बात
और दिखाना न पड़े हमें भी
अपनी या तुम्हारी औकात .


 

Thursday, February 2, 2012

अर्थहीन


बड़ी सफाई से
अपनी वास्तविकता से
नजरें चुरा कर
दिन-रात युक्तियाँ लगाकर
भीषण दुराग्रहों के बीच भी
नहीं जान पाती हैं - स्त्रियाँ
मौन या मुखर
अस्वीकृतियों का राज़
जो उसके प्रति वक़्त-बेवक्त
दिखाया जाता है - जानबूझकर

जबकि पारिवारिक दंगे-फ़साद की
सबसे कोमल और आसान लक्ष्य
वही बनायी जाती है

हरवक्त सुनना पड़ता है - स्त्रियों को
हवा में तैरते फुंकार को
सोखना पड़ता है विष - सांसों से
अमृत बाहर करना पड़ता है

वह उलझती रहती है
नित नई बनती
षड्यंत्रों के मकड़जाल में
और महसूसती है - विशेष अपनापन

हर बार उत्साह से भरकर
देती है हर उस परीक्षा को
जिसका फल उसे पता होता है
कि उसकी दुर्बलता को
आँका जाएगा - शून्य से

और तो और
अपने अटपटे अधूरेपन में भी
बनाती रहती है बेहतर जगह -
पूर्णता के लिए

फिर तय की गयी भंगिमाओं से
भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को
जीवंत करके
गढ़ती रहती है - परिभाषाएँ
सुखी परिवार की

जो बड़ी सफाई से उसी के लिए
बन जाता है - अर्थहीन .

Tuesday, January 17, 2012

मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा


मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
उन अव्यक्त कविताओं /कहानियों की
जो हरपल स्त्रियों से फूटती रहती है
उसकी हर चाह से , हर आह से
जिसे शब्द देने की कोशिश में
लगा देती है वह अपना जीवन
व बन जाती है केवल - एक पात्र
जिसपर लिखी जाती रहती है
दर्दनाक कवितायें,किस्से/कहानियाँ
कामुक ,उत्तेजक, रहस्यपूर्ण ,रोमांचक
बाज़ार की मांग के हिसाब से
लिखने वाले उसे ले जाते हैं
किसी भी मंच पर नुमाईश के लिए
उसे खड़ा कर देते हैं - कतार में
छोटे-बड़े पुरस्कार के लिए
अपनी अजीबो-गरीब मानसिकता का
लबादा ओढ़कर उसे नग्न करते हुए
और वह बन जाती है
केवल एक मुद्दा -विमर्श योग्य
मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
जो स्त्रियों से अव्यक्त होती है ,
जिसे  उन्हीं के समान बना दिया जाता है
जटिलता की संज्ञा देकर - जटिल
उनके प्रश्न जैसे उत्तर की तरह
और उत्तर से प्रश्नों की तरह
उनकी उठती हर चाहत से
वे ही क्यों होती हैं आहत ?
जब पूरी नहीं होती उनकी चाहत तो
क्यों पूरी होती है औरों की चाहत ?
ऐसा भी नहीं कि उनकी चाहत
गूंगी-बहरी होती हैं ,बल्कि
वह चीख-चीख कर मांगती हैं
अपना वाजिब हक़ जो मिलता नहीं
जो विकृत सामंतवादी मानसिकता से
आखिर , लड़ते-लड़ते
हारती-जीतती तो हैं लेकिन तबतक
सुखांत -दुखांत  वाला पृष्ठ
उस का समाप्ति लिख रहा होता है .


Sunday, January 8, 2012

बदरंग


क्या मैं एक खुबसूरत डायरी हूँ
जिसके कोरे पन्ने पर
कोई भी लिख देता है
अपना कच्चा-पक्का चिट्ठा
और मैं बन जाती हूँ
इस काल की मौन गवाह...
क्या मैं एक फोटो फ्रेम हूँ
जिसमें कस दिया जाता है
जबरन कोई भी तस्वीर
पाषाणयुगीन , मध्ययुगीन
या आज के युग का घिनौना सा
जिसमें वे तमाम बातें होती हैं
जिन्हें नहीं होना चाहिए था...
क्या मैं शतरंज की बिछी बिसात हूँ
ताजपोशी के लिए जिसपर
हमेशा  होती रहती हैं
बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ
मर-कट जाते हैं हजारों-लाखों
और मैं शर्म से हुई रहती हूँ
सुर्ख लाल...
क्या मैं अपने आसमान में उड़ती
अकेली तितली हूँ जो
अपने ही मुरझाये फूलों का
पराग चूस-चूस कर
मान लेती हूँ कि
सारे शोख व चटक रंग
मुझमें ही है और
मैं खुद को ही दिखने लगती हूँ-
बदरंग .