Tuesday, April 10, 2012

कई सवाल करती रूपम पाठक को उम्र कैद की सजा

अदालत के फैसले से खुश है स्व. केसरी की पत्नी व पूर्णिया की विधायक किरण केसरी पर संतुष्ट नहीं है . वह उपरी अदालत जायेंगी रूपम पाठक को फांसी की सजा दिलवाने के लिए .वहीं रूपम पाठक की माँ कुमुद पाठक कह रही हैं कि मेरी बेटी को साजिश के तहत मोहरा बनाया गया है . उसका घर उजाड़ा गया और बच्चों को अनाथ कर दिया गया . फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करती समाज सेविका और वकील पद्म श्री सुधा वर्गीज कह रही हैं कि रूपम को पूरा इन्साफ नहीं मिला है . अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ भी 13  अप्रैल को  विरोध दिवस मनायेगा . ये तो है केन्द्रीय भूमिका में नारी के कई रूप पर परदे के पीछे का विद्रूप व भयावह सच है ' लव ,सेक्स और धोखा ' .
                 रूपम पाठक ने ऐसा आत्मघाती कदम क्यों उठाया इसके पीछे एक लम्बी कहानी तो है ही पर आखिरी कड़ी में एक और नारी-पात्र का जुड़ना कहानी के अंत को ये रूप दे जायेगी इसका अंदाजा शायद कहानी के मुख्य पात्रों को भी नहीं था . दबी जुबान में ये खबर भी उभर कर आई थी कि स्व. विधायक  व उसके करीबी कि बुरी नजर रूपम पाठक की बेटी पर पड़ने लगी थी .जो शायद एक माँ को मंजूर नहीं हुआ . खुद नर्क में जीने को मजबूर थी ही पर बेटी की तकदीर में उसी नर्क को नहीं देना चाहा .
            अब राजनीतिक गलियारे से गुजरती महत्वाकांक्षा का हश्र सब देख रहे हैं . सब उसकी चुकाई कीमत का आकलन कर रहे हैं . इस तरह का स्कैंडल , मर्डर , हंगामा अपने पिछले इतिहास के बगल में जगह बना रही हैं . जहाँ वह दफ़न हो सके . इससे जुड़े सवालों का बवंडर यूँ ही घूम-घूम कर शांत हो ही जाएगा . वर्ज्य नारियों का स्वर फिर से दबा दी जायेगी .  

Friday, April 6, 2012

औकात


तुम्हारे भेदभाव पूर्ण नीतियों से
अविश्वास को मिल रहा है बढ़ावा
सवाल उठना तो लाजिमी है
पर तुम्हारी दमनकारी रवैया ने
सवाल को ही पीट-पीट कर
किया है लहुलुहान

फिर आरोपों की बौछार ने
संतुलन को किया है डाँवाडोल
उलटे परामर्श देते हो
रिश्ते को पारदर्शी बनाने का
और अपनी सोच में समीक्षा कर
बढ़ा लेते हो अपनी अपेक्षा

वैधानिक अधिकारों का हवाला देकर
अति कुशलता के सिद्धांतों को
लागू करते हो हम पर
साथ ही बड़ी ढिठाई से
हमें मुक्त करते हो सेवा कर से
तिस पर भी हमें उचित न ठहराना
तुम्हारी दीनता का ही प्रमाण है

तुम क्यों भूलते हो कि
गठजोड़ की राजनीति
समीकरणों से चलती है
मौजूदा हक़ीकत के हिसाब से
पल-पल बदलती है
और संवाद हीनता से बिगड़ती है
न कि अधिकारों को चुनौती देकर
या एकतरफा फैसला लेकर चलती है

एक बात तो साफ़ है
जिसे बस बताने की जरुरत है
कि विकास की अन्धी लहर ने
खोल दी है आँखें हमारी
अब दिन लद गये हैं
दबदबे वाली तुम्हारी

ऐसी बात ना ही करो
जिससे बिगड़े कोई भी बात
और दिखाना न पड़े हमें भी
अपनी या तुम्हारी औकात .


 

Thursday, February 2, 2012

अर्थहीन


बड़ी सफाई से
अपनी वास्तविकता से
नजरें चुरा कर
दिन-रात युक्तियाँ लगाकर
भीषण दुराग्रहों के बीच भी
नहीं जान पाती हैं - स्त्रियाँ
मौन या मुखर
अस्वीकृतियों का राज़
जो उसके प्रति वक़्त-बेवक्त
दिखाया जाता है - जानबूझकर

जबकि पारिवारिक दंगे-फ़साद की
सबसे कोमल और आसान लक्ष्य
वही बनायी जाती है

हरवक्त सुनना पड़ता है - स्त्रियों को
हवा में तैरते फुंकार को
सोखना पड़ता है विष - सांसों से
अमृत बाहर करना पड़ता है

वह उलझती रहती है
नित नई बनती
षड्यंत्रों के मकड़जाल में
और महसूसती है - विशेष अपनापन

हर बार उत्साह से भरकर
देती है हर उस परीक्षा को
जिसका फल उसे पता होता है
कि उसकी दुर्बलता को
आँका जाएगा - शून्य से

और तो और
अपने अटपटे अधूरेपन में भी
बनाती रहती है बेहतर जगह -
पूर्णता के लिए

फिर तय की गयी भंगिमाओं से
भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को
जीवंत करके
गढ़ती रहती है - परिभाषाएँ
सुखी परिवार की

जो बड़ी सफाई से उसी के लिए
बन जाता है - अर्थहीन .

Tuesday, January 17, 2012

मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा


मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
उन अव्यक्त कविताओं /कहानियों की
जो हरपल स्त्रियों से फूटती रहती है
उसकी हर चाह से , हर आह से
जिसे शब्द देने की कोशिश में
लगा देती है वह अपना जीवन
व बन जाती है केवल - एक पात्र
जिसपर लिखी जाती रहती है
दर्दनाक कवितायें,किस्से/कहानियाँ
कामुक ,उत्तेजक, रहस्यपूर्ण ,रोमांचक
बाज़ार की मांग के हिसाब से
लिखने वाले उसे ले जाते हैं
किसी भी मंच पर नुमाईश के लिए
उसे खड़ा कर देते हैं - कतार में
छोटे-बड़े पुरस्कार के लिए
अपनी अजीबो-गरीब मानसिकता का
लबादा ओढ़कर उसे नग्न करते हुए
और वह बन जाती है
केवल एक मुद्दा -विमर्श योग्य
मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
जो स्त्रियों से अव्यक्त होती है ,
जिसे  उन्हीं के समान बना दिया जाता है
जटिलता की संज्ञा देकर - जटिल
उनके प्रश्न जैसे उत्तर की तरह
और उत्तर से प्रश्नों की तरह
उनकी उठती हर चाहत से
वे ही क्यों होती हैं आहत ?
जब पूरी नहीं होती उनकी चाहत तो
क्यों पूरी होती है औरों की चाहत ?
ऐसा भी नहीं कि उनकी चाहत
गूंगी-बहरी होती हैं ,बल्कि
वह चीख-चीख कर मांगती हैं
अपना वाजिब हक़ जो मिलता नहीं
जो विकृत सामंतवादी मानसिकता से
आखिर , लड़ते-लड़ते
हारती-जीतती तो हैं लेकिन तबतक
सुखांत -दुखांत  वाला पृष्ठ
उस का समाप्ति लिख रहा होता है .


Sunday, January 8, 2012

बदरंग


क्या मैं एक खुबसूरत डायरी हूँ
जिसके कोरे पन्ने पर
कोई भी लिख देता है
अपना कच्चा-पक्का चिट्ठा
और मैं बन जाती हूँ
इस काल की मौन गवाह...
क्या मैं एक फोटो फ्रेम हूँ
जिसमें कस दिया जाता है
जबरन कोई भी तस्वीर
पाषाणयुगीन , मध्ययुगीन
या आज के युग का घिनौना सा
जिसमें वे तमाम बातें होती हैं
जिन्हें नहीं होना चाहिए था...
क्या मैं शतरंज की बिछी बिसात हूँ
ताजपोशी के लिए जिसपर
हमेशा  होती रहती हैं
बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ
मर-कट जाते हैं हजारों-लाखों
और मैं शर्म से हुई रहती हूँ
सुर्ख लाल...
क्या मैं अपने आसमान में उड़ती
अकेली तितली हूँ जो
अपने ही मुरझाये फूलों का
पराग चूस-चूस कर
मान लेती हूँ कि
सारे शोख व चटक रंग
मुझमें ही है और
मैं खुद को ही दिखने लगती हूँ-
बदरंग .


Sunday, November 13, 2011

मैं लाश ..


अपनी सड़ी लाश से
चिपकी मैं ही
बहती जा रही हूँ
राहत दल
मंडरा रहे हैं
मेरे इर्द - गिर्द
कई हाथ
बढ़ते हैं मेरी तरफ
उन हाथों में
होता है बहुत कुछ
मानो आपरेशन- कक्ष में
मैं और मेरे
अंग-प्रत्यंग का
मेरी साँसों का
सफल प्रत्यारोपण
उन हाथों के अनुरूप
करना है मुझे
अपना परिवर्तन
अन्यथा मुझे
डूबा दिया जाएगा
किसी सैलाब में
लाश बनकर
तैरने के लिए.

Friday, October 28, 2011

मोल



दूध उबालते समय हरबार
माँ ने यही दुहराया -
बन जाओ अर्जुन
नजर रखो केवल दूध पर
मत चरने दो घास
सोच के घोड़ों को
जब उबल कर
उठने लगे दूध तो
या तो आँच कम कर दो
या कलछी से चलाती रहो
न ही उफनने दो
न ही गिरने दो
हांडी में ही खौलता रहे
दूध तो बेहतर है
धीरे - धीरे वो
बन जाए राबड़ी या खोया
खो दे अपना वास्तविक स्वरूप
और भी बढ़ जाएगा स्वाद
बढ़ जाएगा मोल भी
पर दूध को गिरने न दो
गिरा हुआ दूध
किसी काम का नहीं रहता
अपशकुन ,हाँ अपशकुन ही है
इसलिए मत भूलना -
लड़कियाँ दूध होती है दूध
हांडी में उबलती ही रहे
ढल जाए अनेकों रूप में
विभिन्न स्वाद में
बढ़ता ही जाएगा उसका मोल
पर गिरे दूध पर केवल
मक्खियाँ ही भिनभिनाती है.