Sunday, November 13, 2011

मैं लाश ..


अपनी सड़ी लाश से
चिपकी मैं ही
बहती जा रही हूँ
राहत दल
मंडरा रहे हैं
मेरे इर्द - गिर्द
कई हाथ
बढ़ते हैं मेरी तरफ
उन हाथों में
होता है बहुत कुछ
मानो आपरेशन- कक्ष में
मैं और मेरे
अंग-प्रत्यंग का
मेरी साँसों का
सफल प्रत्यारोपण
उन हाथों के अनुरूप
करना है मुझे
अपना परिवर्तन
अन्यथा मुझे
डूबा दिया जाएगा
किसी सैलाब में
लाश बनकर
तैरने के लिए.

Friday, October 28, 2011

मोल



दूध उबालते समय हरबार
माँ ने यही दुहराया -
बन जाओ अर्जुन
नजर रखो केवल दूध पर
मत चरने दो घास
सोच के घोड़ों को
जब उबल कर
उठने लगे दूध तो
या तो आँच कम कर दो
या कलछी से चलाती रहो
न ही उफनने दो
न ही गिरने दो
हांडी में ही खौलता रहे
दूध तो बेहतर है
धीरे - धीरे वो
बन जाए राबड़ी या खोया
खो दे अपना वास्तविक स्वरूप
और भी बढ़ जाएगा स्वाद
बढ़ जाएगा मोल भी
पर दूध को गिरने न दो
गिरा हुआ दूध
किसी काम का नहीं रहता
अपशकुन ,हाँ अपशकुन ही है
इसलिए मत भूलना -
लड़कियाँ दूध होती है दूध
हांडी में उबलती ही रहे
ढल जाए अनेकों रूप में
विभिन्न स्वाद में
बढ़ता ही जाएगा उसका मोल
पर गिरे दूध पर केवल
मक्खियाँ ही भिनभिनाती है.








Monday, October 17, 2011

परजीवी


वो कहता है
मुझे प्यार हुआ है
मन ही मन
वो कहती है
किससे छल
वो कहता है
सच कहता हूँ
मन ही मन
वो कहती है
हरिश्चंद्र की औलाद
वो कहता है
तुम मेरी हो
मन ही मन
वो कहती है
पहले खुद के हो लो
वो कहता है
तुम सिर्फ मेरी हो
मन ही मन
वो कहती है
तेरे बाप का माल हूँ
वो कहता है
तुम मेरी ख़ुशी हो
मन ही मन
वो कहती है
ख़ुशी का अर्थ जानते हो
वो कहता है
तुम मेरी जिन्दगी हो
मन ही मन
वो कहती है
रजिस्ट्री करा लिए हो
वो कहता है
तुम्हारे बिना मैं
जिन्दा नहीं रह सकता
वह बोल उठती है
परजीवी कहीं का .

Monday, October 3, 2011

चुप्पी


चुप हो जाती मैं
तो क्या होता
बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाती
कतई नहीं

संबंधों के परिप्रेक्ष में
सर्व-श्रेष्ठता का दावा करती
कतई नहीं

यंत्रवत हो रिमोट दे देती
दूसरों के हाथ में
कतई नहीं
  
जिन्दगी का एक पहलू दे देता
दूसरा पहलू भी बख्शीश में
कतई नहीं

कोई सुरक्षा कवच मुझे घेर
हो जाता है अभेद्द
कतई नहीं

संवेदनशीलता,ग्राह्यता,सोच-विचार
दफ़न हो जाते मुझ में ही
कतई नहीं

मुझे अपनी चुप्पी तोड़
कईयों को चुप कराना है

जो चुपके से
मजबूर करते रहतें हैं
कईयों को चुप रहने के लिए

और चुपचाप चुप्पी के ही
अँधेरी गहरी खाई में गिराकर
विवश करते हैं  
चुप हो जाने के लिए
सदा के लिए .
     
 

Friday, September 23, 2011

जीत


माँ ! तुम्हारे भी
ठंडी छाँव देने वाले
आँचल तले
अमृत पिलाने वाले
वक्षों तले
सोई हुई चिंगारी है
ठन्डे राख तले

सच -सच कहो माँ !
तुम्हे कितनी-कितनी बार
किस-किस तरह से
किसने-किसने तोड़ा
कैसे-कैसे टूटी तुम

माँ !
तुम इतनी वात्सल्यमयी
ममतामयी , शांत ,स्निग्द्ध
गहरा मौन
गहरे राज़ को छुपाये हुए
बोलती आँखे
सच को छुपाये हुए

माँ ! तुम्हे बताना होगा
तुम्हारी प्रतिच्छाया -- मैं
तुमसे विपरीत कैसे ?
विद्रोह का बीज
कहाँ से आया मुझमें ?
आज जो बन गया है
वटवृक्ष
उसकी जड़ें फ़ैल रही है
दूर -दूर तक

माँ !
तुम्हारी प्रतिमूर्ति -- मैं
अच्छी तरह जानती हूँ
तुम्हारे ह्रदय को
एक-एक स्पंदन को
एक-एक विचलन को
हमें जोड़ने के लिए
क्या तुमने
टूटना स्वीकारा ?

ओ मेरी टूटी माँ !
अब तुम्हे जोड़ने के लिए
तोड़ना पड़ेगा मुझे
उन बंधनों को
जिसे तुम तोड़ न पायी

ओ मेरी प्यारी माँ !
तब सही मायने में
तुम्हारी ही होगी
जीत .


Friday, September 16, 2011

रौद्र-रूप


गिड़गिड़ा कर
कुछ भी मांग लो
कर्ण बन जाऊँगी
दुर्योधन जो बनोगे
मैं भी अर्जुन बन जाऊँगी ..


द्रौपदी नहीं जो
भरी सभा में सब मिल
तमाशा बना दोगे
दु:शासन जो बनोगे तो
मैं ही सुदर्शन-चक्र चलाऊँगी..


दाँव तुम लगाते हो
और जीत भी जाते हो
लेकिन अब तो
जीतने की बारी हमारी है
सीधी चाल में न जीती तो
छल करने में
कृष्ण नहीं तो शकुनी बन जाऊँगी...


अरे ! गिरगिटों
झाँक कर देख तो जरा
अपने गिरेबान में
क्या-क्या दिया है हमने तुमको
प्यार दिया है,परिवार दिया है
आधार दिया है,अधिकार दिया है
तुममे खोकर,तुम्हे चरितार्थ किया है...


ऐ ! मगरमच्छों
तुमने तो बस
छल और अत्याचार किया है
स्वार्थवश प्यार का व्यापार किया है...


अब भी संभल जाओ,रूक जाओ
बंद करो ये कपट-नीति
हाँ ! करवट ले रही है
हमारी भी सोई शक्ति...


जब रौद्र-रूप अपनाउँगी तो
हर घर में हर पल
कभी न थमने वाला
महाभारत करवाउँगी .  

Tuesday, August 30, 2011

छीछालेदर


उन महानतम क्षणों में
अपनी लघुता को आत्मसात कर
कपड़ों के साथ
आदर्श व अहंकार को उतार
आदम जात में शामिल हो
उस परमानन्द में डूब कर
सच - सच कहो
भूल जाते हो न
अपनी विकसित मनुष्यता को...

ज्ञान , बुद्धि ,विवेक को
अपने ओढ़े शर्म के साथ
तार -तार कर
सच -सच कहो
बन जाते हो न
पूरे जानवर...

उस सुख के लिए
दूसरों पर निर्भर..

फिर ये झूठा दंभ
श्रेष्ठता का दावा..

हम तो श्रेष्ठ है ही
धरा समान
आजीवन ढोतें हैं तुम्हे..

हम दोनों से अलग
सच्चाई जानकर भी
चुप रहते हैं जानवर
जो सबकुछ स्वीकार करते हैं
सहज रूप से
बिना छीछालेदर के.



Tuesday, July 26, 2011

शव - साधना


और वात्सायन जाग उठा
अँधेरी कोठरी में फन उठाये
डसने को आतुर उसकी प्रेत-इच्छायें
लपलपाता जीभ फिरने लगा
बुधिया के बेसुध पड़े शरीर पर
पाँच बच्चों की माँ - बुधिया
कोल्हू की बैल सी थककर
निढाल हो सोयी पड़ी थी
अपने से भी - बेखबर
कि कोई जहरीला जीव
उसके अंत:पुर से गर्भ में
प्रवेश करने की तैयारी में है
दूधपीता बच्चा कुनमुनाया
चिपक गया उसकी छाती से
वात्सायन की फुफकार
तेज़ और तेज़ होने लगी
नए आसन की खोज में
बच्चे के मुंह से छूट गया चूचक
रोते-रोते बच्चा फिर चिपक गया
उसकी छाती से
वात्सायन भी सफल हुआ
जहर छोड़ने में
बुधिया सोई रही
न जाने किस नींद में
उसे न निकलते अमृत का पता चला
न ही चढ़ते जहर का
वाह ! रे वात्सायन
तुम नए आसन की खोज करते हो
या ....शव - साधना .
 

Thursday, July 7, 2011

नर-भ्रूण

उत्तर प्रदेश में मचा है हाहाकार
कहाँ नहीं हो रहा है    बलात्कार
नारी अस्मिता पर    ऐसा प्रहार
व अस्तित्व का ही हो रहा संहार

महामाया तो है ही  महा ठगिनी
बलात्कारियों से कर रही मंगनी
न्याय की देवी    दे रही है पुकार
नहीं सुनी जाती उसकी चीत्कार

अपना कोख  क्यों  दे रहा है गाली
हिजड़ों की जमात बजाते हैं ताली
समय मांग रहा है  बड़ा परिवर्तन
अब   नारी     करे    तांडव-नर्तन

अपनी  शक्ति     स्वयं   पहचाने
सबल- सृस्टा   वही है   यह माने
बेटे की लिप्सा को अब  वह छोड़े
रुढियों को आगे बढ़-बढ़कर तोड़े

सशक्त कदम अब बढ़ाना होगा
कन्या-भ्रूण को ही  बचाना होगा
चाहे दुश्मन पूरी दुनिया हो जाए
क्यों नहीं  वह  नर-भ्रूण  गिराए ??????

Tuesday, June 14, 2011

कठमोझी


न जाने कबसे
चलता आ रहा है
ये षड़यंत्र
नारी बन जाए
जीता-जागता यन्त्र

कभी आँखों की
पुतली को
कब,क्यूँ और कैसे
बना दिया जाता है
आँखों में पड़ा
हर-पल चुभता हुआ
धूलि-कण .....

असह्य दर्द से
निज़ात पाने के लिए
चलता रहता है
अनवरत उपक्रम ....

और तो और
ना-नुकुर की अंशमात्र
संभावना को देखते हुए
उसके अस्तित्व को ही
डोरी से फँसाकर
बाध्य किया जाता है
अँगुलियों पर
नाचने के लिए...
.
जिससे
हर कनिमोझी
बनती रहे - कठमोझी
एक जीती-जागती
काठ की पुतली...

हाँ ....नित-नयी 
तमाशा दिखाने वाली
कुछ-कुछ
सनसनीखेज़ सी....

या यूँ कह ले
मसालेदार,मनोरंजक .

Friday, May 20, 2011

वजूद


क्या मैं
पेड़ से झड़ती हुई
सूखी पत्तियां हूँ
जो बिखरी पड़ी है
तुम्हारे क़दमों के
आस-पास

हवाएं अक्सर
उड़ा ले जाती है
मुझे तुमसे
दूर बहुत दूर

तुम्हारे कदम भी
पीछा करते हैं मेरी
ताकि तुम मुझे
रौंदो -मसलो
ख़त्म कर दो
मेरा वजूद

फिर भी
मैं वही रहूंगी
जो मैं हूँ .

Friday, February 18, 2011

ग्लानि


ओ प्यारी मैना !
मैं भी तेरी बहना
तू चौखट के बाहर
मैं चौखट के अन्दर
तेरे आँखों के ही जैसा
मुझ में भी है समंदर
तू चुगती है दाना
उडती आकाश में
मैं बनती हूँ खाना
न जाने जीती हूँ
किस आस में
तू गाती मीठी गीत
फुदक-फुदक कर
जहाँ -जहाँ  
नहीं है कोई मीत
चाहे ढुंढुं मैं
यहाँ-वहाँ
ओ मेरी मैना !
तू मुझसे अच्छी है न
तेरे ऊपर न कोई पहरा
रस्मों-रिवाजों का
न तेरे लिए घर बना है
बंद दरवाजों का
ओ मैना !
जरा दूर ही रहना
मुझको ग्लानि  होती है
ओठ तो हँसते हैं
पर आत्मा केवल रोती है .


Saturday, February 5, 2011

तल के तले

एक तल पर तुम
एक और तल पर मैं...
दोनों एक दूसरे के
तल के तले......
रिश्तों की अतल गहराइयां
 दोनों -डूबते उतराते
प्राण-वायु 
वासनाओं की
दमित इच्क्षाएं 
हमारे पैरों तले
न फूटने वाले
मजबूरियों के बुलबुले
न जीते न मरते हम 
दबे रहते हमेशा
एक-दूसरे के भार तले
या दबाये रहते ?
जिसके हाथ लग जाता
कलछी-कडाही
उसी के तेल में तल
हड्डियाँ सहित
खाने को आतुर..
स्वादिष्ट ,जायकेदार
लाजवाब व्यंजन बनाकर 
मेरी जान!
ये जीवन का समंदर है
न ही हम
ठहर सकते
निचली तल पर
न ही उपरी तल पर..
हमें बनाते रहना है
एक-दूसरे को तल
या खींचते रहना है
क्या फर्क पड़ता है ?

Tuesday, January 18, 2011

दुहाई

तुम्हारा दावा
कब हवा हो जाती है
कब तुम
बन जाते हो चक्रवात
प्यार का चिंदी-चिंदी उड़ाकर
तुम कर ही नहीं सकते- प्यार
तुम्हारी न शांत होने वाली भूख
तुम्हे क्या-क्या बना देती है ...
तुम्हे जरुर पता होगा
गिरगिट का शरीर
लपलपाते जीभ
अगले ही पल रूप बदल
मगर सा कुशल शिकारी ....
तुम्हे जिलाए रखेगी
आने वाले
कई करोड़ वर्षों तक...
नहीं जरुरत है तुम्हे
ओढ़ने की
सियार का खाल..
बस तुम चुप ही रहो
नहीं दुहाई दो
प्यार की.....
शांत करते रहो
अपनी भूख....
बस ये मत कहो
मैं तुम्हे प्यार करता हूँ
सदियों -सदियों से