Tuesday, January 18, 2011

दुहाई

तुम्हारा दावा
कब हवा हो जाती है
कब तुम
बन जाते हो चक्रवात
प्यार का चिंदी-चिंदी उड़ाकर
तुम कर ही नहीं सकते- प्यार
तुम्हारी न शांत होने वाली भूख
तुम्हे क्या-क्या बना देती है ...
तुम्हे जरुर पता होगा
गिरगिट का शरीर
लपलपाते जीभ
अगले ही पल रूप बदल
मगर सा कुशल शिकारी ....
तुम्हे जिलाए रखेगी
आने वाले
कई करोड़ वर्षों तक...
नहीं जरुरत है तुम्हे
ओढ़ने की
सियार का खाल..
बस तुम चुप ही रहो
नहीं दुहाई दो
प्यार की.....
शांत करते रहो
अपनी भूख....
बस ये मत कहो
मैं तुम्हे प्यार करता हूँ
सदियों -सदियों से