Friday, February 18, 2011

ग्लानि


ओ प्यारी मैना !
मैं भी तेरी बहना
तू चौखट के बाहर
मैं चौखट के अन्दर
तेरे आँखों के ही जैसा
मुझ में भी है समंदर
तू चुगती है दाना
उडती आकाश में
मैं बनती हूँ खाना
न जाने जीती हूँ
किस आस में
तू गाती मीठी गीत
फुदक-फुदक कर
जहाँ -जहाँ  
नहीं है कोई मीत
चाहे ढुंढुं मैं
यहाँ-वहाँ
ओ मेरी मैना !
तू मुझसे अच्छी है न
तेरे ऊपर न कोई पहरा
रस्मों-रिवाजों का
न तेरे लिए घर बना है
बंद दरवाजों का
ओ मैना !
जरा दूर ही रहना
मुझको ग्लानि  होती है
ओठ तो हँसते हैं
पर आत्मा केवल रोती है .


Saturday, February 5, 2011

तल के तले

एक तल पर तुम
एक और तल पर मैं...
दोनों एक दूसरे के
तल के तले......
रिश्तों की अतल गहराइयां
 दोनों -डूबते उतराते
प्राण-वायु 
वासनाओं की
दमित इच्क्षाएं 
हमारे पैरों तले
न फूटने वाले
मजबूरियों के बुलबुले
न जीते न मरते हम 
दबे रहते हमेशा
एक-दूसरे के भार तले
या दबाये रहते ?
जिसके हाथ लग जाता
कलछी-कडाही
उसी के तेल में तल
हड्डियाँ सहित
खाने को आतुर..
स्वादिष्ट ,जायकेदार
लाजवाब व्यंजन बनाकर 
मेरी जान!
ये जीवन का समंदर है
न ही हम
ठहर सकते
निचली तल पर
न ही उपरी तल पर..
हमें बनाते रहना है
एक-दूसरे को तल
या खींचते रहना है
क्या फर्क पड़ता है ?