Friday, February 18, 2011

ग्लानि


ओ प्यारी मैना !
मैं भी तेरी बहना
तू चौखट के बाहर
मैं चौखट के अन्दर
तेरे आँखों के ही जैसा
मुझ में भी है समंदर
तू चुगती है दाना
उडती आकाश में
मैं बनती हूँ खाना
न जाने जीती हूँ
किस आस में
तू गाती मीठी गीत
फुदक-फुदक कर
जहाँ -जहाँ  
नहीं है कोई मीत
चाहे ढुंढुं मैं
यहाँ-वहाँ
ओ मेरी मैना !
तू मुझसे अच्छी है न
तेरे ऊपर न कोई पहरा
रस्मों-रिवाजों का
न तेरे लिए घर बना है
बंद दरवाजों का
ओ मैना !
जरा दूर ही रहना
मुझको ग्लानि  होती है
ओठ तो हँसते हैं
पर आत्मा केवल रोती है .


15 comments:

  1. nari jeevan ki poori vedna utari hai

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  2. नारी जीवन की विडंम्बना को दर्शा रही है यह रचना ...मर्मस्पर्शी

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  3. धन्यवाद, मेरे ब्लॉग से जुड़ने के लिए और बहुमूल्य टिपण्णी देने के लिए

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  4. मर्मस्पर्शी रचना |
    नवसंवत्सर २०६८ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  5. कित्ती सुन्दर कविता...खूबसूरत भाव...बधाई.
    ____________________
    'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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  6. सुंदर कविता /भाव और शब्द दोनों उत्कृष्ट बधाई और शुभकामनाएं |

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  7. sunder rachna ke liye aaapko bahut bahut badhai

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  8. प्रभाव डालने में कामयाब रचना ....हार्दिक शुभकामनायें !

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  9. Vyatha ki katha marmsparshi hai..

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  10. पिंजरे की मैना और नीलगगन की मैना का अंतर समझा गई आपकी रचना .बधाई .

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  11. दिल को छूने वाली रचना ।

    बहुत खूब ।

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  12. ओह, गहन संवेदनशीलता !

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