Tuesday, June 14, 2011

कठमोझी


न जाने कबसे
चलता आ रहा है
ये षड़यंत्र
नारी बन जाए
जीता-जागता यन्त्र

कभी आँखों की
पुतली को
कब,क्यूँ और कैसे
बना दिया जाता है
आँखों में पड़ा
हर-पल चुभता हुआ
धूलि-कण .....

असह्य दर्द से
निज़ात पाने के लिए
चलता रहता है
अनवरत उपक्रम ....

और तो और
ना-नुकुर की अंशमात्र
संभावना को देखते हुए
उसके अस्तित्व को ही
डोरी से फँसाकर
बाध्य किया जाता है
अँगुलियों पर
नाचने के लिए...
.
जिससे
हर कनिमोझी
बनती रहे - कठमोझी
एक जीती-जागती
काठ की पुतली...

हाँ ....नित-नयी 
तमाशा दिखाने वाली
कुछ-कुछ
सनसनीखेज़ सी....

या यूँ कह ले
मसालेदार,मनोरंजक .