Tuesday, July 26, 2011

शव - साधना


और वात्सायन जाग उठा
अँधेरी कोठरी में फन उठाये
डसने को आतुर उसकी प्रेत-इच्छायें
लपलपाता जीभ फिरने लगा
बुधिया के बेसुध पड़े शरीर पर
पाँच बच्चों की माँ - बुधिया
कोल्हू की बैल सी थककर
निढाल हो सोयी पड़ी थी
अपने से भी - बेखबर
कि कोई जहरीला जीव
उसके अंत:पुर से गर्भ में
प्रवेश करने की तैयारी में है
दूधपीता बच्चा कुनमुनाया
चिपक गया उसकी छाती से
वात्सायन की फुफकार
तेज़ और तेज़ होने लगी
नए आसन की खोज में
बच्चे के मुंह से छूट गया चूचक
रोते-रोते बच्चा फिर चिपक गया
उसकी छाती से
वात्सायन भी सफल हुआ
जहर छोड़ने में
बुधिया सोई रही
न जाने किस नींद में
उसे न निकलते अमृत का पता चला
न ही चढ़ते जहर का
वाह ! रे वात्सायन
तुम नए आसन की खोज करते हो
या ....शव - साधना .
 

Thursday, July 7, 2011

नर-भ्रूण

उत्तर प्रदेश में मचा है हाहाकार
कहाँ नहीं हो रहा है    बलात्कार
नारी अस्मिता पर    ऐसा प्रहार
व अस्तित्व का ही हो रहा संहार

महामाया तो है ही  महा ठगिनी
बलात्कारियों से कर रही मंगनी
न्याय की देवी    दे रही है पुकार
नहीं सुनी जाती उसकी चीत्कार

अपना कोख  क्यों  दे रहा है गाली
हिजड़ों की जमात बजाते हैं ताली
समय मांग रहा है  बड़ा परिवर्तन
अब   नारी     करे    तांडव-नर्तन

अपनी  शक्ति     स्वयं   पहचाने
सबल- सृस्टा   वही है   यह माने
बेटे की लिप्सा को अब  वह छोड़े
रुढियों को आगे बढ़-बढ़कर तोड़े

सशक्त कदम अब बढ़ाना होगा
कन्या-भ्रूण को ही  बचाना होगा
चाहे दुश्मन पूरी दुनिया हो जाए
क्यों नहीं  वह  नर-भ्रूण  गिराए ??????