Thursday, July 7, 2011

नर-भ्रूण

उत्तर प्रदेश में मचा है हाहाकार
कहाँ नहीं हो रहा है    बलात्कार
नारी अस्मिता पर    ऐसा प्रहार
व अस्तित्व का ही हो रहा संहार

महामाया तो है ही  महा ठगिनी
बलात्कारियों से कर रही मंगनी
न्याय की देवी    दे रही है पुकार
नहीं सुनी जाती उसकी चीत्कार

अपना कोख  क्यों  दे रहा है गाली
हिजड़ों की जमात बजाते हैं ताली
समय मांग रहा है  बड़ा परिवर्तन
अब   नारी     करे    तांडव-नर्तन

अपनी  शक्ति     स्वयं   पहचाने
सबल- सृस्टा   वही है   यह माने
बेटे की लिप्सा को अब  वह छोड़े
रुढियों को आगे बढ़-बढ़कर तोड़े

सशक्त कदम अब बढ़ाना होगा
कन्या-भ्रूण को ही  बचाना होगा
चाहे दुश्मन पूरी दुनिया हो जाए
क्यों नहीं  वह  नर-भ्रूण  गिराए ??????

30 comments:

  1. सही बात कही है आपने.

    सादर

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  2. jaagrukta ke kami ke chalte aur varshon purani soch ko badalne mein samay lagega lekin pariwartan dheere dheere aayega jarur....
    badiya prastuti...

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  3. अपनी शक्ति स्वयं पहचाने
    सबल- सृस्टा वही है यह माने
    बेटे की लिप्सा को अब वह छोड़े
    रुढियों को आगे बढ़-बढ़कर तोड़े

    समाज को चेतावनी देता एक आहवान ....सही मायने में अब समाज को अपनी सोच बदलनी होगी ...आपका आभार इस सशक्त रचना के लिए ....!

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  5. desh ki pragati tabhi sambhav hai!!
    shashakt rachna.......

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  6. बहुत सटीक और सार्थक पोस्ट है.....उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था का तो इस्वर ही मालिक है|

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  7. सशक्त रचना !
    सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार !
    आभार !

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  8. देवि वर्ज्या ,
    क्यों कोई भ्रूण वह गिराए ...
    नर हो या नारी
    सभी भ्रूणों की है बराबरी ...
    कुपुत्रो जायेत माता कुमाता न भवति ..
    कोई माँ क्यों बने भ्रूण हन्ता ?
    बेहद अफसोसनाक अभिव्यक्ति ...
    मैं निराश हुआ ......
    कविता सर्वजन हिताय हो ,लोक मंगलकारी हो ...
    यही हमारी श्रेष्ठ परम्परा है ...और मैं इससे विचलित नहीं हो सकता ...
    ( सृष्टा )

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  9. बहुत अच्छी सशक्त प्रस्तुति।

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  10. मैं पीड़ा से सहमत हूँ मगर प्रतिक्रियावादी विचारों से सहमत नहीं आप के

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  11. हमें लगता है एक तो प्रसाद जी की इन पंक्तियों का विलोम लिखा जाए -
    अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ,
    आँचल में है दूध और आँखों में पानी .
    और तुलसी बाबा की इन विवादित पंक्तियों को भी नया सन्दर्भ दिया जाए -
    शूद्र गंवार ढोल पशु नारी ,सकल ताड़ना के अधिकारी .
    हाँ पुरुष को श्रृष्टि संचालन से अलग रखा जा सकता है .क्लोनिग के ज़रिए दो औरतें मादा भ्रूण और फिरसिर्फ लडकियां रच सकतीं हैं .वैसे भी दम्भी वाई -गुण सूत्र (वाई -क्रोमोसोम )छीज रहा है .
    नारी सर्जक है .स्रष्टा है ,इस कायनात को चला रही है .सृष्टि की बागडोर उसके हाथ है .वह क्रिया कर सकती .प्रति -क्रिया करेगी तो क्लोनिग के ज़रिए अपने और सिर्फ अपने हम -शक्ल ,हम-बुद्धि और हम -लिंगी जनेगी (सारी टेस्ट ट्यूबबेबी गढ़ेगी ). उर्वशी बनेगी .

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  12. अद्भुत सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

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  13. नर-मादा के संतुलन के लिए नर-भ्रूण हत्या का अच्छा सुझाव है :)

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  14. समाज तक यह संदेश पहुचना ही चाहिए।

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  15. संवेदनाये मानवता के दायरे में हो तो अच्छी है..हिंसा का जबाब किसी और पर प्रतिहिंसा से नहीं दिया जा सकता

    सुव्यवस्था सूत्रधार मंच-सामाजिक धार्मिक एवं भारतीयता के विचारों का साझा मंच..

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  16. हमारी आदिकाल से परंपरा रही है , यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता . भ्रूण हत्या तो मानवता के लिए अभिशाप है . आक्रोश झलक रहा है कविता में .

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  17. Satya to yah hai ki......

    Naree hi Naree ki dushman hai.....

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  18. सशक्त प्रस्तुति

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  19. बहुत गहरी बात कह दी आपने। बधाई।

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  20. एक नए अंदाज में कही बात..सशक्त स्वर..बधाई.
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    शब्द-शिखर / विश्व जनसंख्या दिवस : बेटियों की टूटती 'आस्था'

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  21. बहुत सशक्त स्वर..आज सभी को इसके विरुद्ध आवाज उठानी ही होगी. बहुत सुन्दर रचना..

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  22. सशक्त एवं क्रांतिकारी आह्वान करती हुई रचना .....
    घृणित सोच में परिवर्तन जरूरी है

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  23. pl visit http://sb.samwaad.com/

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  24. शब्दों का अभाव महसूस कर रहा हुं सिर्फ यही कहुंगा " No comment "

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