Tuesday, July 26, 2011

शव - साधना


और वात्सायन जाग उठा
अँधेरी कोठरी में फन उठाये
डसने को आतुर उसकी प्रेत-इच्छायें
लपलपाता जीभ फिरने लगा
बुधिया के बेसुध पड़े शरीर पर
पाँच बच्चों की माँ - बुधिया
कोल्हू की बैल सी थककर
निढाल हो सोयी पड़ी थी
अपने से भी - बेखबर
कि कोई जहरीला जीव
उसके अंत:पुर से गर्भ में
प्रवेश करने की तैयारी में है
दूधपीता बच्चा कुनमुनाया
चिपक गया उसकी छाती से
वात्सायन की फुफकार
तेज़ और तेज़ होने लगी
नए आसन की खोज में
बच्चे के मुंह से छूट गया चूचक
रोते-रोते बच्चा फिर चिपक गया
उसकी छाती से
वात्सायन भी सफल हुआ
जहर छोड़ने में
बुधिया सोई रही
न जाने किस नींद में
उसे न निकलते अमृत का पता चला
न ही चढ़ते जहर का
वाह ! रे वात्सायन
तुम नए आसन की खोज करते हो
या ....शव - साधना .
 

31 comments:

  1. पहली नजर की एक बेलौस कविता -मुला काहे हमरे पुरखे पुरनियों को कोस रही हैं -कोसना ही है तो ऊ नटखट बालक कामदेव को कोसिये जो अनंग होकर भी अंग अंग को बेबस कर देता है ....
    बुधिया की बेबसी भी समझ आ रही है मगर आदमी बेचारा क्या करे अपने वश में नहीं है न ऊ !

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  2. आपकी गहन अभिव्यक्ति ने झकझोर दिया मन को.
    बेबसी की मार्मिक व्यथा.

    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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  3. Beautiful presentation of thoughts !

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  4. बेबसी यही होती है।
    एक बेहद गंभीर और सोचने को मजबूर करती कविता।

    सादर

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  5. दमदार रचना...कितनो का सच बयान करती रचना

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  6. उफ्फ्फ.......कितना भयानक रूप दिया है आपने काम को और वात्सयायन का नाम देकर......कमाल की पोस्ट|

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  7. इब्नेसफ़ी के मायाजाल से कोई नहीं बच सकता’ ... तो क्या इब्ने सफ़ी वात्सायन है???

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  8. सुंदर बिम्ब प्रयोग!

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  9. गहन अनुभूति लिए मन को छू लेने वाली सार्थक अभिव्यक्ति....

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  10. गहन संवेदनायें दिल को छू गयी। सुन्दर रचना। शुभकामनायें।

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  11. ये शव साधना है या शव भोग या कोई कापालिक क्रिया ?बहर सूरत वात्सायन को आपने इस कविता में इतना नीचे क्यों गिरा दिया .संवेदन शून्य शव भोग ,शव भक्षण ,शोषण तेरे रूप अनेक .धर्म ,अर्थ,और काम सृष्टि के नियंता है विध्वंसक नहीं .कविता पूरे मानस को संवेदन शून्य करके छोड़ देती है .

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  12. कल 29/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. nari ki marmik sthiti ka sarthak varnan

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  14. गहन भावों का समावेश इस अभिव्‍यक्ति में ।

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  15. बेमिसाल रचना ....दुखद पर कटु सत्य ..हर पंक्ति का मार्मिक भाव मन को उद्वेलित कर गया .

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  16. सत्य को कहती गहन रचना ... नि:शब्द हूँ ...

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  17. क्या लिखूं इसे पढ़ कर यही सोच रही हूँ. खुद ही शब्दों का आभाव महसूस कर रही हूँ

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  18. Thanks to halchal
    jiske kaaran mai bhi itni syndar rachana padh saka.
    Aabhaar

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  19. सुंदर ,गम्भीर और दार्शनिक कविता बधाई

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  20. शव साधना समपन्न कर - .शुक्रिया .कृपया यहाँ भी पधारें -http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/search?updated-max=2011-08-06T18%3A53%3A00%2B05%3A30&max-results=१५
    निश्चेतक (एन्ज्थीज़िया ) कोमा के ज्यादा करीब पड़ता है .
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    शुक्रवार, ५ अगस्त २०११
    Erectile dysfunction? Try losing weight Health

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  21. लीक से हटकर लिखी गई यह कविता कुछ सोचने के लिए विवश करती है।

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  22. शुक्रवार, ५ अगस्त २०११
    Erectile dysfunction? Try losing weight Health
    http://sb.samwaad.com/
    आखिर इस दर्द की दवा क्या है?
    Posted by veerubhai on Friday, August 5
    Labels: -वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई), pain killer and pain, ड्रग एडिक्‍ट, दर्दनाशी, नशीली दवाएं शुक्रिया मोतर्मा "शव साधना फिर"पढ़ी .काम मुग्धा भाव से ही किया जाता है .हम उसका अपवाद नहीं हैं लेकिन फ़ोकसिंग सम -केन्द्रता आपकी बहुत ज्यादा है .शुक्रिया आपका .

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  23. बेहद मार्मिक रचना .....
    यथार्थ का विषवमन अच्छा है झूठ मूठ के अमृतवचनों से ..

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  24. अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

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  25. गहन मार्मिक अभिव्यक्ति अंदर तक झकझोर देती है..बहुत उत्कृष्ट प्रस्तुति..

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  26. एक नयी अनुभूति एक नया विचार ! खूबसूरत कल्पना ...सुन्दर अभिव्यक्ति ................
    आपको मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं

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  27. मेरे ब्लॉग पर आपके आने का मैं बहुत बहुत आभारी हूँ.

    फिर से आईयेगा मेरी अगली पोस्ट पर.
    हो सके तो भक्ति, शिवलिंग पर भी अपने सुविचार
    प्रकट करके अनुग्रहित कीजियेगा.

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  28. कठोर हक़ीकत बयान करती सशक्त कविता। बहुत बढ़िया।

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