Tuesday, August 30, 2011

छीछालेदर


उन महानतम क्षणों में
अपनी लघुता को आत्मसात कर
कपड़ों के साथ
आदर्श व अहंकार को उतार
आदम जात में शामिल हो
उस परमानन्द में डूब कर
सच - सच कहो
भूल जाते हो न
अपनी विकसित मनुष्यता को...

ज्ञान , बुद्धि ,विवेक को
अपने ओढ़े शर्म के साथ
तार -तार कर
सच -सच कहो
बन जाते हो न
पूरे जानवर...

उस सुख के लिए
दूसरों पर निर्भर..

फिर ये झूठा दंभ
श्रेष्ठता का दावा..

हम तो श्रेष्ठ है ही
धरा समान
आजीवन ढोतें हैं तुम्हे..

हम दोनों से अलग
सच्चाई जानकर भी
चुप रहते हैं जानवर
जो सबकुछ स्वीकार करते हैं
सहज रूप से
बिना छीछालेदर के.