Tuesday, August 30, 2011

छीछालेदर


उन महानतम क्षणों में
अपनी लघुता को आत्मसात कर
कपड़ों के साथ
आदर्श व अहंकार को उतार
आदम जात में शामिल हो
उस परमानन्द में डूब कर
सच - सच कहो
भूल जाते हो न
अपनी विकसित मनुष्यता को...

ज्ञान , बुद्धि ,विवेक को
अपने ओढ़े शर्म के साथ
तार -तार कर
सच -सच कहो
बन जाते हो न
पूरे जानवर...

उस सुख के लिए
दूसरों पर निर्भर..

फिर ये झूठा दंभ
श्रेष्ठता का दावा..

हम तो श्रेष्ठ है ही
धरा समान
आजीवन ढोतें हैं तुम्हे..

हम दोनों से अलग
सच्चाई जानकर भी
चुप रहते हैं जानवर
जो सबकुछ स्वीकार करते हैं
सहज रूप से
बिना छीछालेदर के.



34 comments:

  1. adbhut shabdo ka prayog......shreshth rachana

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  2. उम्दा सोच
    भावमय करते शब्‍दों के साथ गजब का लेखन ...आभार ।

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  3. ईद के त्योंहार की हार्दिक शुभकामनायें.... हैप्पी ईद :)

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  4. आपके गहन भावों को अभिव्यक्त करती इस प्रस्तुति के लिए आभार.

    ईद मुबारक.

    मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार है जी.

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  5. जानकार की जगह "जानकर "और उतार को जगह दें "उताड़:"की जगह ,अन्यथा न लें .इतनी सुन्दर प्रस्तुति के साथ वर्तनी की अशुद्धि अच्छी नहीं लगती है -सबसे बड़ा आनंद ही पृथ्वी पर सम्भोगानंद हैं और उस देहरी तक पहुँचने के लिए ,एहंकार और पशुता भी बाहर खजुराहो के गर्भ गृह के बाहर की भित्तियों पर उकेरे चित्रों के साथ ही छोडनी पड़ती है .तभी शिव लिंग के दर्शन परमानंद की प्राप्ति होती है .इस सच से जो शाश्वत है कौन इनकार कर सकता है .पशुता कैसी यहाँ तो व्यक्ति संज्ञा शून्य हो जाता है उपभोक्ता और उपभोग्य का द्वैत तिरोहित हो जाता है .अच्छी पोस्ट है "छीछालेदर ".बधाई .

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  6. जीवन के वास्तविक आधार केवल छीछालेदर न हो तो और खुबसूरत हो जाती है ! जीवन तो सही तरह से जीने का नाम है - पशुता नहीं चाहे मर्द हो या नारी !आप के विचार भी एक रूप है ! गणेश चतुर्दश की शुभ कामनाये !

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  7. पुरुषो को चुनौती देते स्वर.
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  8. itne khule swar ... satya kee is aag ko projjwalit ker aapne bahut kuch kaha- sarahniye

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  9. हम तो े है ह धरा समान आजीवन ढोत ह तुहे..
    ji Ha. .. Yahi to sach hai lekin hamne kahan kaha ki ham bade hai
    tumhi shresth ho. ..priye...
    Sabn

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  10. हम तो े है ह धरा समान आजीवन ढोत ह तुहे..
    ji Ha. .. Yahi to sach hai lekin hamne kahan kaha ki ham bade hai
    tumhi shresth ho. ..priye...
    Sabn

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  11. बहुत सुन्दर और लाजवाब रचना ! बेहतरीन प्रस्तुती !
    आपको एवं आपके परिवार को ईद और गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

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  12. यही तो अंतर है जानवर और मनुष्य मे। जानवर अपने समय से भोग करता है और मनुष्य तो मौके की तलाश में पशु से बद्द्धत हो जाता ही। गहरी सोच की कविता॥

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  13. आदरणीय महोदया, प्रश्न तो आपने बडा प्रासंगिक उठाया है, लेकिन मैं यह सोच रहा था कि अभी आपने श्री अरविन्द मिश्रा जी के ब्लाग पर ‘लगे रहो मुन्ना भाई ’ की तर्ज पर ‘ तो फिर लगे रहो शव साधना में....’ की सलाह दी थी और यहाँ आकर साधक की श्रेष्ठता को ही प्रश्नचिन्हित कर रही हैं
    । वैसे किसी भी साधना में किसकी स्थिति श्रेष्ठ होती है साधक की अथवा साधन या साध्य की? उत्तर जो भी हो परन्तु सच्चा साधक अंत में यही कहेगा कि आप ही श्रेष्ठ है। (आखिर साधक को अपनी साधना के मार्ग के सभी कंटको को हटाकर ही तो आगे बढने का अवसर उपलब्ध हो सकेगा)

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  14. haits off.............very nice....

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  15. बहुत ही सुंदर कविता बधाई और शुभकामनाएं

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  16. सच है ..... सटीक सधी हुईं पंक्तियाँ

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  17. हे भगवान् ,दुनिया के चरम आनंद के क्षणों की ऐसी छीछालेदर!
    वह घना आनंद जो सत चित आनंद के समतुल्य है ...
    दुनिया में ऐसी प्रवंचित मुट्ठीभर मानवता क्यों है है भगवन जिन्हें आपने इस नैसर्गिकता का
    सामीप्य नहीं दिया और वे जब प्रवंचना से भरा क्रंदन करते हैं तो मेरा स्वत्व ,अस्तित्व दयार्द्र हो उठता है ..
    काश मैं मानवता के इस लघु समूह का त्राण कर पाता!
    एक प्रति कविता:
    बाह्य पहनावों ,बस चमड़ी भर तक
    की दिखावटी सभ्यता को त्याग
    जब तुम आते मेरे पास
    अपनी समस्त नैसर्गिकता और
    मौलिकता में ,
    करते हो उस सघन -सुख का
    आह्वान ,तब तब तुम करते हो
    मनुष्यता को जीवंत और अलंकृत

    भला मनुजता को साकार करने का
    ऐसा कौन सा है बेहतर दूजा उपाय
    और तब तब तुम अहसास कराते हो
    मेरी अस्मिता और वजूद का .....
    हम तुम एक इसी क्षण को ही
    तो जीने को समग्रता के साथ
    आये हैं इस धरा पर
    छोड़ जाने को अपनी प्रतिकृतियाँ
    जो ऐसे ही इस धरा को
    बनाए रखेगीं जीवंत
    दिग दिगंत और युगान्तरों तक
    (देवि यह आपको ससम्मान पवित्र मन से
    वाराणसी के एक पुण्य प्रात को समर्पित है )

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  18. गणेत्सोसव की हार्दिक शुभकामनाएं

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  19. आदरणीय अरविन्द मिश्रा जी @ दुःख मुझे भी बहुत होता है ऐसी विषमता पर. हाथ बंधे होने के कारण आक्रोश में बदल जाता है. कटु शब्द या भाव इसलिए है कि अब तो पुरुष -अपनी मानसिकता बदले . अबला, असहाय पर कितना अत्याचार .जो निर्भर है , आप जैसे रखे. जो स्त्री आत्मनिर्भर है उसके लिए ये नहीं है. हो सकता है वे भी शिकार होती होंगी. आपकी टिपण्णी को पढ़कर ह्रदय भर आया. अगर आप इस पर कुछ करेंगे तो मुझे अत्यधिक ख़ुशी होगी.

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  20. श्री अशोक शुक्ला जी @ पुरुष ईमानदारी से अपने गिरेवान में झांकना शुरू करे तो हकीकत नजर आने लगेगी. हाँ! आँखों पर कोई चश्मा न लगाये.

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  21. आदरणीय वीरू भाई @गलती बताने के लिए हार्दिक आभार. मैंने सुधार लिया है.

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  22. @वर्ज्य नारी स्वर,
    मैं अब कहूं भी तो क्या -निःशब्द!
    और मैं तो नर नारी में कभी कोई फर्क भी करता ...
    सच्ची ,कसम से! मैं तो मनसा वाचा कर्मणा यही सोचता हूँ (लीला की बात अलग है )
    सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया
    सर्वे भद्राणु पश्यन्ति माँ कश्चिद दुःख भा भवेत् !
    और यह भी -
    ना त्वहम कामये राज्यं न स्वर्गम न पुनर्भवं
    कामये दुःख तप्तानाम प्राणिनाम आर्त नाशनं
    (क्या हिन्दी अनुवाद करना जरुरी है ,इतने घने भाव की कविता लिखने वाले को अर्थ मालूम होगा )

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  23. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  24. अच्छी पोस्ट है "छीछालेदर "| धन्यवाद|

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  25. मैं इसे छीछालेदर नहीं उत्सव का क्षण मानता हूँ।

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  26. सामाजिक विषमता को ध्येय कर लिखी गई इस रचना में जिस मानसिकता का वर्णन किया गया है वह हमारे समाज की नींव में दीमक सा असर कर रहा है और मानवता की छीछालेदर हो रही है।

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  27. बढ़ते भौतिकवाद ने मानवतावाद की ही छीछालेदर कर रक्खी है.

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  28. सपष्ट शब्दों में अपनी भाव को व्यक्त करती खूबसूरत रचना |

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  29. बहुत प्रभावी .. पर ये छीछ्लेदारी जो जीवन का अंग है ... हाँ अहम दिखाना गलत है ... काल चक्र में सब सामान हैं ..

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  30. bhut acha bhav hai par hai jo bhi is dhara main sab kuch naisargik hai ekkariat ke rup main le to adyatm ki trah ki nirvicharita hai aur bhog ki trah le to insan ka janratv hai jo bhi hai par pure rahe bas usme koi milawat aur koi waad na aaye tabhi mother earth ka samman rahega

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