Friday, September 23, 2011

जीत


माँ ! तुम्हारे भी
ठंडी छाँव देने वाले
आँचल तले
अमृत पिलाने वाले
वक्षों तले
सोई हुई चिंगारी है
ठन्डे राख तले

सच -सच कहो माँ !
तुम्हे कितनी-कितनी बार
किस-किस तरह से
किसने-किसने तोड़ा
कैसे-कैसे टूटी तुम

माँ !
तुम इतनी वात्सल्यमयी
ममतामयी , शांत ,स्निग्द्ध
गहरा मौन
गहरे राज़ को छुपाये हुए
बोलती आँखे
सच को छुपाये हुए

माँ ! तुम्हे बताना होगा
तुम्हारी प्रतिच्छाया -- मैं
तुमसे विपरीत कैसे ?
विद्रोह का बीज
कहाँ से आया मुझमें ?
आज जो बन गया है
वटवृक्ष
उसकी जड़ें फ़ैल रही है
दूर -दूर तक

माँ !
तुम्हारी प्रतिमूर्ति -- मैं
अच्छी तरह जानती हूँ
तुम्हारे ह्रदय को
एक-एक स्पंदन को
एक-एक विचलन को
हमें जोड़ने के लिए
क्या तुमने
टूटना स्वीकारा ?

ओ मेरी टूटी माँ !
अब तुम्हे जोड़ने के लिए
तोड़ना पड़ेगा मुझे
उन बंधनों को
जिसे तुम तोड़ न पायी

ओ मेरी प्यारी माँ !
तब सही मायने में
तुम्हारी ही होगी
जीत .


Friday, September 16, 2011

रौद्र-रूप


गिड़गिड़ा कर
कुछ भी मांग लो
कर्ण बन जाऊँगी
दुर्योधन जो बनोगे
मैं भी अर्जुन बन जाऊँगी ..


द्रौपदी नहीं जो
भरी सभा में सब मिल
तमाशा बना दोगे
दु:शासन जो बनोगे तो
मैं ही सुदर्शन-चक्र चलाऊँगी..


दाँव तुम लगाते हो
और जीत भी जाते हो
लेकिन अब तो
जीतने की बारी हमारी है
सीधी चाल में न जीती तो
छल करने में
कृष्ण नहीं तो शकुनी बन जाऊँगी...


अरे ! गिरगिटों
झाँक कर देख तो जरा
अपने गिरेबान में
क्या-क्या दिया है हमने तुमको
प्यार दिया है,परिवार दिया है
आधार दिया है,अधिकार दिया है
तुममे खोकर,तुम्हे चरितार्थ किया है...


ऐ ! मगरमच्छों
तुमने तो बस
छल और अत्याचार किया है
स्वार्थवश प्यार का व्यापार किया है...


अब भी संभल जाओ,रूक जाओ
बंद करो ये कपट-नीति
हाँ ! करवट ले रही है
हमारी भी सोई शक्ति...


जब रौद्र-रूप अपनाउँगी तो
हर घर में हर पल
कभी न थमने वाला
महाभारत करवाउँगी .