Friday, September 16, 2011

रौद्र-रूप


गिड़गिड़ा कर
कुछ भी मांग लो
कर्ण बन जाऊँगी
दुर्योधन जो बनोगे
मैं भी अर्जुन बन जाऊँगी ..


द्रौपदी नहीं जो
भरी सभा में सब मिल
तमाशा बना दोगे
दु:शासन जो बनोगे तो
मैं ही सुदर्शन-चक्र चलाऊँगी..


दाँव तुम लगाते हो
और जीत भी जाते हो
लेकिन अब तो
जीतने की बारी हमारी है
सीधी चाल में न जीती तो
छल करने में
कृष्ण नहीं तो शकुनी बन जाऊँगी...


अरे ! गिरगिटों
झाँक कर देख तो जरा
अपने गिरेबान में
क्या-क्या दिया है हमने तुमको
प्यार दिया है,परिवार दिया है
आधार दिया है,अधिकार दिया है
तुममे खोकर,तुम्हे चरितार्थ किया है...


ऐ ! मगरमच्छों
तुमने तो बस
छल और अत्याचार किया है
स्वार्थवश प्यार का व्यापार किया है...


अब भी संभल जाओ,रूक जाओ
बंद करो ये कपट-नीति
हाँ ! करवट ले रही है
हमारी भी सोई शक्ति...


जब रौद्र-रूप अपनाउँगी तो
हर घर में हर पल
कभी न थमने वाला
महाभारत करवाउँगी .  

37 comments:

  1. कभी न थमने वाला ,
    महाभारत करवाऊंगी .
    मैं रण चंडी बन जाऊंगी ,
    नर मुंड तुझे पहराऊंगी .
    क्षमा करो देवी ,क्षमा करो ,
    इस अधम नर को क्षमा करो ,
    तुम क्षमा शील कहलाती हो ,,
    ममता से गले लगाती हो .......
    अच्छा बिम्ब !अच्छी रचना !
    रचना शीला ,,तुम हो विधाता की अनुपम रचना !

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  2. जब रौद्र रूप अपनाऊंगी ,तो ,
    हर घर में हर पल ,
    कभी न थमने वाला ,
    महाभारत करवाऊंगी .
    मैं रण चंडी बन जाऊंगी ,
    नर मुंड तुझे पहराऊंगी .
    क्षमा करो देवी ,क्षमा करो ,
    इस अधम नर को क्षमा करो ,
    तुम क्षमा शील कहलाती हो ,,
    ममता से गले लगाती हो .......
    अच्छा बिम्ब !अच्छी रचना !
    रचना शीला ,,तुम हो विधाता की अनुपम रचना !

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  3. मन को उद्वेलित करने वाली रचना...
    हार्दिक बधाई.

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  4. वाह वाह
    प्यार दिया ,अधिकार दिया,
    परिवार दिया आधार दिया
    तुम में खो कर ,तुम्हे चरितार्थ किया,
    फिर बचा कर रखा ही क्या?
    अब कुछ भी देने या खोने को बचा ही क्या ?
    आशा किसी सोई शक्ति की जो अज तक नहीं जगी.और शायद कभी .......?वीरांगना जन्म से होती है .ओड़ी
    नहीं जाती.इंतजार नहीं करती किसी रौद्र रूप की ,लिखती है अपनी गाथा अपने भीतर की आवाज से अपने शोर्य से अपने तेजस्विता से.

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  5. बहुत उद्वेलित कर दिया आपने तो मन को.....

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  6. एक बार ऐसे ही भाव मेरे मन में भी जगे थे...

    अब नहीं नहीं हे पती देव
    अब आगे लक्ष्मण रेखा है
    तुमने अब तक नारी को
    बस लुटते जलते देखा है

    जो रूक न सके इंसानों से
    मैं प्रलय कारिणी दंगा हूं
    अच्छा है यह भ्रम बना रहे
    तुम परमेश्वर मैं गंगा हूँ।

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  7. एक नया महाभारत रचने के लिए आज की नारी तैयार है ॥

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  8. ज्यादा दिन नहीं है ऐसा होने में।

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  9. http://premchand-sahitya.blogspot.com/

    यदि आप को प्रेमचन्द की कहानियाँ पसन्द हैं तो यह ब्लॉग आप के ही लिये है |

    यदि यह प्रयास अच्छा लगे तो कृपया फालोअर बनकर उत्साहवर्धन करें तथा अपनी बहुमूल्य राय से अवगत करायें |

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  10. कब तक यूँ ही अत्याचार सहन होंगे ..कभी तो रौद्र रूप दिखाना ही होगा ... मन को झंझोदाती अच्छी प्रस्तुति

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  11. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 19-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  12. ज़बरदस्त!
    ----
    कल 19/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. इस रचना का आक्रोश शायद उन सोई आत्माओं को जगाए!

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  14. आक्रोश की सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  15. वाह ! वाह ! वाह !
    गज़ब की प्रस्तुति ....जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है |

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  16. कविता क्या है तूफ़ान है जी
    भावनाओं का प्रचंड उफान है जी.
    क्या गजब किया आपने,पूरा सम्मान है जी

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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  17. बहुत खूब ... शब्‍दों के भाव गतिमान हैं ... आभार इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

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  18. मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
    आइये चले मेरे साथ छिंदवाड़ा स्थित श्री बादल भोई जनजातीय संग्रहालय...... संजय भास्कर
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2011/09/blog-post_19.html

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  19. बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति ..

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  20. लाजवाब !बहुत सार्थक अभिव्यक्ति। इतने सशक्त लेखन को नमन है आपकी लेखनी को... बधाई

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  21. अच्छा बिम्ब !अच्छी रचना !
    रचना शीला ,,तुम हो विधाता की अनुपम रचना !ब्लोगिया दस्तक के लिए शुक्रिया .
    सोमवार, १९ सितम्बर २०११
    मौलाना साहब की टोपी मोदी के सिर .

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  22. नारी का रौद्र रूप उजागर किया है ..............पर मैं यही कहूँगा सारे पुरुष मगरमच्छ नहीं होते :-)

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  23. ओजस्वी ... आज नारी को ये रूद्र रूप दिखाना ही पढ़ेगा ... चंडी बनना ही पड़ेगा ... समाज में बदलाव तभी आयगा ...

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  24. हाँ करवट ले रही है - हमारी सोयी शक्ति ! बहुत ही ओजपूर्ण और चुनौती पूर्ण ! बधाई !

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  25. प्रिय महोदया
    ,आपकी लेखनी में विद्रोहात्मक स्वर अद्धितीय है
    । उक्त पंक्तियों के लिये बधाई देते हुये अंकित करना चाहूँगा कि निःसंन्देह नारी का रौद्र रूप भयावह होता है जिसमें संघार की अपार क्षमता होती है परन्तु उसका स्नेहिल स्वरूप क्या कम संहारकारी होता है ?
    कृपया अन्यथा न लें ! संघार का तात्पर्य सिर्फ भौतिक संघार से ही क्यों लें? सामान्यतः विद्यमान मान्यताओं और मनोवृत्तियों का संघार तो उसका स्नेहिल स्वरूप ही करता है ना!स्त्री के माँ स्वरूप को यदि अपवाद मानें तो इतिहास गवाह है कि अपने शेष समस्त स्वरूपों में वह कितनी अनप्रेडिक्टिबल होती है। मुझे तो लगता है कि सिर्फ और सिर्फ पुरूष की सहगामिनी और पूरक होने की दशा में ही वह सर्जक होती है और पुरूष से विरत होने की प्रत्येक स्थिति में वह संहारक ही हाती है। (क्षमा याचना सहित)

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  26. कैसे दूर करें शिकायतें ?
    शिकायतें उनसे होती हैं, जिनसे प्यार होता है ?

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  27. बहुत सटीक और भावपूर्ण रचना |बधाई
    आशा

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  28. निस्संदेह....आपकी कविता बड़ी उत्प्रेरक है....बहुत ही रौद्र स्वरुप वाली....साथ ही मैं भाई अशोक कुमार शुक्ल की टिपण्णी से सहमत हूँ...जिन्होंने इसी स्थिति का उलटा स्वरुप दिखाकर....उससे भी प्रेरक बनाने,होने,करने की कामना करते हैं....

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  29. बहुत सुन्दर जज्बात ! विद्रोह का ये स्वर मंद नहीं पड़ना चाहिए !

    लोग निंदा करें या स्तुति करें ,धन आवे या हम कंगाल हो जाएँ .

    अभी मर जाएँ या युगों के बाद मर जाएँ ,लेकिन सत्य के मार्ग से विचलित नहीं हो सकते .

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  30. Revolutionary creation.. Regards..

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  31. कुछ नारियां माहाभारत ही तो करातीं आयी है -पुराण इतिहास साक्षी हैं! किसको फर्क पड़ता है ?
    बस इतिहास कुछ टेढ़ा हो उठता है !
    कैकेयी द्रौपदी कभी भी जनमानस प्रिय नहीं रहीं -वक्त कम है सुधर जाईये :)
    जीवन ऐसे ही निष्फल नहीं किया जाता ....बड़े जतन मानुष तन पावा !

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  32. महिलाए तो होती ही झगडे की जड़ हैं..........इसमें नया क्या है..........

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