Friday, September 23, 2011

जीत


माँ ! तुम्हारे भी
ठंडी छाँव देने वाले
आँचल तले
अमृत पिलाने वाले
वक्षों तले
सोई हुई चिंगारी है
ठन्डे राख तले

सच -सच कहो माँ !
तुम्हे कितनी-कितनी बार
किस-किस तरह से
किसने-किसने तोड़ा
कैसे-कैसे टूटी तुम

माँ !
तुम इतनी वात्सल्यमयी
ममतामयी , शांत ,स्निग्द्ध
गहरा मौन
गहरे राज़ को छुपाये हुए
बोलती आँखे
सच को छुपाये हुए

माँ ! तुम्हे बताना होगा
तुम्हारी प्रतिच्छाया -- मैं
तुमसे विपरीत कैसे ?
विद्रोह का बीज
कहाँ से आया मुझमें ?
आज जो बन गया है
वटवृक्ष
उसकी जड़ें फ़ैल रही है
दूर -दूर तक

माँ !
तुम्हारी प्रतिमूर्ति -- मैं
अच्छी तरह जानती हूँ
तुम्हारे ह्रदय को
एक-एक स्पंदन को
एक-एक विचलन को
हमें जोड़ने के लिए
क्या तुमने
टूटना स्वीकारा ?

ओ मेरी टूटी माँ !
अब तुम्हे जोड़ने के लिए
तोड़ना पड़ेगा मुझे
उन बंधनों को
जिसे तुम तोड़ न पायी

ओ मेरी प्यारी माँ !
तब सही मायने में
तुम्हारी ही होगी
जीत .


28 comments:

  1. सकारात्मक भाव की रचना ,जीवन में सम्पूर्णता तलाशती ,पक्षपात का निर्मूलन करने को प्रति -बद्ध.बहुत सुन्दर प्रस्तुति .

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  2. आदरणीया ……… जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    आह ! कविता है या जज़बातों का जज़ीरा ?
    दरअस्ल आपका ब्लॉग ही भावनाओं का एक टापू है … जहां पहुंच कर मुझ जैसे जज़बाती कभी उदास तो कभी विवश महसूस करते हैं ।
    कभी झल्लाहट होती है उन पर जिनके कठोर आचरण से पूरे पुरुष समाज को कोमल हृदय वाली कोमलांगियों द्वारा भय , शक , घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगता है …

    …लेकिन हर हाल में यह आपकी लेखनी की जीत तो है ही न !
    ♥ हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !♥

    निवेदन है, कभी कोई अच्छा अनुभव भी हुआ हो तो बांटिए अवश्य ! गहरी संवेदना से पूर्ण लेखनी के उस अनूठे प्रसाद को पा'कर मुझे हार्दिक संतुष्टि होगी ।

    सपरिवार आपके लिए मंगलकामनाएं हैं …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. माँ पर लिखी गयी एक उम्दा कविता बधाई

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  4. सच -सच कहो माँ !
    तुम्हे कितनी-कितनी बार
    किस-किस तरह से
    किसने-किसने तोड़ा
    कैसे-कैसे टूटी तुम

    मान की हर टूटन से खुद को मजबूती देती बेटी के भाव ..बहुत अच्छे लगे ..

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  5. एक विनम्र अनुरोध आपसे या तो आप ब्लाग पर अपना वास्तविक फोटो लगा दें या फिर अपना वास्तविक नाम लिख दें |आपसे किसी भी तरह का तारतम्य नहीं बन पाता |इसे अन्यथा न लें कवि मन का सहज उद्गार है |

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  6. माँ की भावनाओं को बहुत गहराई से महसूस किया है...सदैव की तरह एक उत्कृष्ट प्रस्तुति..

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  7. निश्चित ही यह एक सुन्दर सी कविता है मगर मुझे आपसे कुछ कहना है ....जान बूझ कर चाहते हुए भी नहीं आ रहा था यहाँ ..खैर ! कविता बहुत अच्छी है बाकी का क्या लेना देना -

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  8. Really a very appealing poem on mother.My bestb wishes.
    dr.bhoopendra
    rewa

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  9. यदि यह बंधन तोड़ दिए गए तो मां मां नही मात्र नारी रहेगी॥

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  10. बहुत ही खुबसूरत रचना ...

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  11. आपकी रचना मन को आंदोलित कर गयी । मेरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  12. कल 26/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. माँ की भावनाओं को संतान समझ ले तो उसकी उद्विग्नता को शीतलता तो मिलती ही है.

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  14. एक बहुत ही सशक्त एवं वज़नदार रचना ! एक एक शब्द मन पर अंकित सा होता जाता है विलक्षण प्रभाव के साथ ! अति सुन्दर !

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  15. बहुत ही सुन्दर जज्बातों से भरी पोस्ट.......हैट्स ऑफ इसके लिए |

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  16. बहुत प्रभावी और सशक्त अभिव्यक्ति ..

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  17. हर शब्‍द गहरे उतरता हुआ ...भावमय करती अभिव्‍यक्ति ।

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  18. बेटियों को खड़े होना पढ़ेगा आई माँ के लिए .. उसके स्वाभिमान के लिए ... भावमय रचना ...

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  19. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  20. इंसानी जज्बात को झकझोरती रचना.. बहुत ही उम्दा रचना..

    एक बात - आपने अपने ब्लॉग के आवरण जो में दिखाया है और जो छिपाया है.. बहुत अच्छी लगी..

    आपका बहुत-बहुत आभार.. बहुत खुश हूँ कि आप जैसी रचनाकार मेरी रचनाओं को तवज्जो दे रही हैं..हौंसलों में गजब का इजाफा हुआ है..

    सपरिवार आपको फिर से नवरात्रि कि हार्दिक शुभकामनाएं.. माँ दुर्गा कि असीम कृपा आप पर बनी रहे..
    आपकी लेखनी कि तरह आपका भविष्य भी दिनोंदिन निखरता रहे.. आपकी सारी मनोकामना पूर्ण हो...

    जय माता दी..

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  21. इंसानी जज्बात को झकझोरती रचना|
    नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएँ|

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  22. फिर आया यह कहने के लिए कि रचना वाकई बहुत मार्मिक है -
    महफ़िल से मुझे निकाल के कहीं पछता रहें हो न आप
    इस ख़याल से दुबारा फिर यहाँ आ गया हूँ मैं :)
    चलिए कहा सुना माफ करिए !

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