Friday, October 28, 2011

मोल



दूध उबालते समय हरबार
माँ ने यही दुहराया -
बन जाओ अर्जुन
नजर रखो केवल दूध पर
मत चरने दो घास
सोच के घोड़ों को
जब उबल कर
उठने लगे दूध तो
या तो आँच कम कर दो
या कलछी से चलाती रहो
न ही उफनने दो
न ही गिरने दो
हांडी में ही खौलता रहे
दूध तो बेहतर है
धीरे - धीरे वो
बन जाए राबड़ी या खोया
खो दे अपना वास्तविक स्वरूप
और भी बढ़ जाएगा स्वाद
बढ़ जाएगा मोल भी
पर दूध को गिरने न दो
गिरा हुआ दूध
किसी काम का नहीं रहता
अपशकुन ,हाँ अपशकुन ही है
इसलिए मत भूलना -
लड़कियाँ दूध होती है दूध
हांडी में उबलती ही रहे
ढल जाए अनेकों रूप में
विभिन्न स्वाद में
बढ़ता ही जाएगा उसका मोल
पर गिरे दूध पर केवल
मक्खियाँ ही भिनभिनाती है.








Monday, October 17, 2011

परजीवी


वो कहता है
मुझे प्यार हुआ है
मन ही मन
वो कहती है
किससे छल
वो कहता है
सच कहता हूँ
मन ही मन
वो कहती है
हरिश्चंद्र की औलाद
वो कहता है
तुम मेरी हो
मन ही मन
वो कहती है
पहले खुद के हो लो
वो कहता है
तुम सिर्फ मेरी हो
मन ही मन
वो कहती है
तेरे बाप का माल हूँ
वो कहता है
तुम मेरी ख़ुशी हो
मन ही मन
वो कहती है
ख़ुशी का अर्थ जानते हो
वो कहता है
तुम मेरी जिन्दगी हो
मन ही मन
वो कहती है
रजिस्ट्री करा लिए हो
वो कहता है
तुम्हारे बिना मैं
जिन्दा नहीं रह सकता
वह बोल उठती है
परजीवी कहीं का .

Monday, October 3, 2011

चुप्पी


चुप हो जाती मैं
तो क्या होता
बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाती
कतई नहीं

संबंधों के परिप्रेक्ष में
सर्व-श्रेष्ठता का दावा करती
कतई नहीं

यंत्रवत हो रिमोट दे देती
दूसरों के हाथ में
कतई नहीं
  
जिन्दगी का एक पहलू दे देता
दूसरा पहलू भी बख्शीश में
कतई नहीं

कोई सुरक्षा कवच मुझे घेर
हो जाता है अभेद्द
कतई नहीं

संवेदनशीलता,ग्राह्यता,सोच-विचार
दफ़न हो जाते मुझ में ही
कतई नहीं

मुझे अपनी चुप्पी तोड़
कईयों को चुप कराना है

जो चुपके से
मजबूर करते रहतें हैं
कईयों को चुप रहने के लिए

और चुपचाप चुप्पी के ही
अँधेरी गहरी खाई में गिराकर
विवश करते हैं  
चुप हो जाने के लिए
सदा के लिए .