Friday, October 28, 2011

मोल



दूध उबालते समय हरबार
माँ ने यही दुहराया -
बन जाओ अर्जुन
नजर रखो केवल दूध पर
मत चरने दो घास
सोच के घोड़ों को
जब उबल कर
उठने लगे दूध तो
या तो आँच कम कर दो
या कलछी से चलाती रहो
न ही उफनने दो
न ही गिरने दो
हांडी में ही खौलता रहे
दूध तो बेहतर है
धीरे - धीरे वो
बन जाए राबड़ी या खोया
खो दे अपना वास्तविक स्वरूप
और भी बढ़ जाएगा स्वाद
बढ़ जाएगा मोल भी
पर दूध को गिरने न दो
गिरा हुआ दूध
किसी काम का नहीं रहता
अपशकुन ,हाँ अपशकुन ही है
इसलिए मत भूलना -
लड़कियाँ दूध होती है दूध
हांडी में उबलती ही रहे
ढल जाए अनेकों रूप में
विभिन्न स्वाद में
बढ़ता ही जाएगा उसका मोल
पर गिरे दूध पर केवल
मक्खियाँ ही भिनभिनाती है.








32 comments:

  1. हरेक पंक्ति बहुत मर्मस्पर्शी है। कविता अच्छी लगी ।

    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. ज़बरदस्त प्रतीकों का प्रयोग..........शानदार प्रस्तुति........बहुत सुन्दर|

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  3. लड़कियों कि उपमा दूध से और उनका बढ़ता हुआ मोल .. बहुत अच्छी रचना

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  4. बहुत ही अलग हटकर बेहतरीन कविता।

    सादर

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  5. सटीक और अद्भुत..निशब्द कर दिया.

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  6. गज़ब का बिंब तलाशा है अभिव्यक्ति के लिए! जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है। ..दिल से बधाई।
    परजीवी की तरह अनूठी व मौलिक अभिव्यक्ति।

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  7. गिरे दूध पर सिर्फ मक्खियाँ ही भिनभिनाती है ...
    गंभीर सन्देश है स्त्रियों के लिए
    बहुत बढ़िया ...बेहतरीन !

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  8. गहन अभिव्यक्ति।
    चिंतनपरक कविता।

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  9. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद। ।

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  10. bahut sunder shabdo mein sab kuch keh diya.........

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  11. Gahra chintan ... naari vyatha par aapki kalam khoob chalti hai ...

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  12. बढिया कविता... पर दूध के उबाल को अपशकुन नहीं शुभ मानते है और गृहप्रवेश में तो जान बूझ कर दूध को उबाल कर नीचे बहाया जाता है। स्त्री भी गृह की शोभा होती है और शुभशकुन भी॥

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  13. आदरणीय महोदया
    जितनी सुन्दरता से आपने आँच पर चढे हुये दूध को बिंब के रूप में उपयोग करते हुये नारी जीवन के समूचे फलसफे को प्रतिबिंबित कर दिया है वह अद्धितीय है। इतनी आसान आधारों पर जीवन का सार अभिब्यक्त करने के लिये आप बधाई की पात्रा हैं।
    कुछ समय पूर्व मैने भी इसी बिंब का उपयोग करते हुये एक पुरूष की मनोदशा को चिन्हित करने का प्रयास किया था जो आपके अवलोकनार्थ सादर समर्पित हैं।

    तुम्म्हारी आँच
    जीवन की
    सर्द और स्याह रातों में
    भटकते भटकते आ पहुँचा था
    तुम तक
    उष्णता की चाह में
    और तुम्हारी ऑच
    जैसे धीरे धीरे समा रही है मुझमें
    ठीक उसी तरह
    जैसे धीमी ऑच पर
    रखा हुआ दूध
    जो समय के साथ
    हौले हौले अपने अंदर
    समेट लेता है सारे ताप को
    लेकिन उबलता नहीं
    बस भाप बनकर
    उडता रहता है तब तक
    जब तक अपना
    मृदुल अस्थित्व मिटा नहीं देता
    और बन जाता है
    ठेास और कठोर
    कुछ ऐसे ही सिमट रहा हूँ मैं
    लगातार हर पल
    शायद ठोस और कठोर
    होने तक या
    उसके भी बाद
    ऑच से जलकर
    राख होने तक ?
    आपकी पोस्ट सराहनीय है शुभकामनाऐं
    !!

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  14. बहुत अच्छी प्रस्तुति। दिल को छू लिया।

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  15. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त कविता लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!

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  16. लड़कियों की तुलना दूध से गुणों की खान है बहुत अच्छा लगा. लड़कियों के महत्व को पहचानना आवश्यक है.

    बहुत अच्छी प्रस्तुति.

    बधाई.

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  17. प्रभावशाली कविता.... बहुत सुंदर

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  18. गहन भाव लिये बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  19. वाह नारी के रूप का बहुत खूबसूरत चित्रण |

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  20. कमाल के बिम्ब... उत्कृष्ट रचना

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  21. सरल शब्दोँ मेँ सशक्त भाव पिरोये हैँ आपने । उत्कृष्ट रचना !

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  22. प्रतीकों का सुंदर प्रयोग साथ में सशक्त भाव का अनूठा संगम.

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  23. आदरणीया ……… जी !
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    क्या सुखद संयोग है … मैं आपके यहां आया हुआ हूं … और आप मेरे यहां !! :)

    कमेंट अभी बाद में लिखूंगा
    आभार और मंगलकामनाएं स्वीकार करें …


    # आपने पहले मेरा अनुरोध स्वीकार करके अपना परिचय और ईमेल आईडी भेजी थी … 20000 मेल्स की भीड़ में आपकी वह मेल ढूंढना मुश्किल हो रहा है … सबको दीवाली की शुभकामनाएं भेजते समय मैंने आपको बहुत याद किया था …

    क्या पुनः अपने संक्षिप्त परिचय सहित आपकी ईमेल आईडी भेजने की कृपा करेंगी …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  24. लीक से हटकर
    लेकिन बहुत सुंदर

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  25. गिरे हुए दूध पर तो मक्खियां ही भिनभिनाती हैं
    बहुत बड़ी बात कहदी आपने …
    औरत अगर ख़ुद को सम्हाल कर न रख पाए तो उसकी दशा गिरे हुए दूध की तरह ही होती है …

    ऐसे ही मिलते- जुलते - भाव मेरे लिखे कुछ दोहों में भी है ,



    श्रेष्ठ रचना के लिए साधुवाद !


    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  26. .



    # और हां ,
    अशोक कुमार शुक्ला जी !
    आपकी कविता भी कमाल की है … बधाई !

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  27. आदरणीय राजेन्द्र जी,
    धन्यवाद
    काश कि ब्लाग लेखिका ने भी इस कविता को इसी शिद्दत से पढा होता??

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  28. अशोक शुक्ला जी @ क्या सोच कर आपने ये नेक सलाह दे डाली. मैंने केवल नारी-पक्ष को रखा तो दूध ही बना डाला और आपको बताऊँ तथाकथित पुरुष जो होते हैं ऐसे बिल्ला होते हैं जिनपर हमेशा कीड़े-मकोड़े , मक्खियाँ ही भिनभिनाया करते हैं.आप भी नारी-विमर्श करके अपनी रोटी ही तो सेंकने पर लगे हुए हैं. जरा अपने अन्दर झाँका भी कीजिये.

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  29. राजेंद्र जी @, जो दिखाया जाता है वो जरुर देखें , अगर आँखे पायी है तो उसके पीछे भी जरुर झांक लें. नारी को जबरन दूध बनाया जाता है. नारी तो केवल नारी ही बनना चाहती है.

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  30. आदरणीया ‘वजर््य नारी स्वर’ महोदया
    मै आपकी टिप्पणी का आशय समझ नहीं पाया। कौन सी नेक सलाह? मेरे विचार से प्रत्येक रचनाकार के लिये उसकी रचना उसके शिशु जैसी होती है और उसे अपने नजदीकी नातेदार रिश्तेदारों का प्यार पाने की अपेक्षा स्वाभाविक होती है। (फिर यहाँ तो मेरी शिशु रचना अपनी बुआ के घर पर आयी थी से स्नेह की अपेक्षा स्वाभाविक थी।) और हाँ! और कौन से तथाकथित पुरूष बिल्ला होते हैं जिन पर मक्खियाँ भिनभिनाती हैं? उपरोक्त पंक्तियों में तो मैने आज के चलते फिरते इन्सान के अन्दर जो मर चुका आदमी यानी (आदमीयत) की चर्चा की थी आपको इसमें बिल्ला पुरूष और भिनभिनाती मक्खियाँ कहाँ नजर आ गयीं?
    और रही बात हमारे द्वारा नारी विमर्श करते हुये अपनी रोटियाँ सेकने की तो आपके सद्भावना पूर्वक अवगत कराना चाहता हूँ ब्लागों पर आकर टिप्पणियाँ लिखकर मेरी रोटियाँ नहीं सिंकती। कभी अवसर पाकर उत्तर प्रदेश में मेरे विभिन्न तैनाती स्थलों पर जाकर पडताल अवश्य करियेगा कि मैंने नारी विमर्श के नाम पर रोटी सेंकी है या कुछ परिवारो को छत और चूल्हा मुहैया कराया है।
    आपकी टिप्पणी कुछ असहज करने जैसी लगी।

    रही बात आपके ब्लाग पर आने की तो सहजता से अवगत कराना चाहता हूँ कि आपकी ‘शव साधना’ कविता पढकर मैं इतना प्रभावित हुआ था कि स्वयं को आपके ब्लाग पर आने से नहीं रोक सका। पुनः कहूँगा के आपकी कवितायें प्रभावशाली हैं यदि आपको मेरा आपके ब्लाग पर आना अरूचिकर एवं अवांछनीय लगता है तो अपने इस दुःसाहस के लिये क्षमा चाहूँगा।

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  31. बहुत सराहनीय प्रस्तुति. आभार. बधाई आपको

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