Sunday, November 13, 2011

मैं लाश ..


अपनी सड़ी लाश से
चिपकी मैं ही
बहती जा रही हूँ
राहत दल
मंडरा रहे हैं
मेरे इर्द - गिर्द
कई हाथ
बढ़ते हैं मेरी तरफ
उन हाथों में
होता है बहुत कुछ
मानो आपरेशन- कक्ष में
मैं और मेरे
अंग-प्रत्यंग का
मेरी साँसों का
सफल प्रत्यारोपण
उन हाथों के अनुरूप
करना है मुझे
अपना परिवर्तन
अन्यथा मुझे
डूबा दिया जाएगा
किसी सैलाब में
लाश बनकर
तैरने के लिए.

24 comments:

  1. बहुत ही तीखा व्यंग्य, पर सच के क़रीब!

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  2. आदरणीय महोदया
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं। अपनी लाश से स्वयं चिपके रहकर अपनी ओर राहत के लिये बढते हाथों की कठपुतली बनने का आपका विचार ही आज के सभ्य समाज में आपसी समझौता कहलाता है। आताताइयों के इस समाज में हम सभी लोग आजकल शायद अपनी अपनी लाश को ही तो ढो रहे है। कुछ पंक्तियाँ हमारी भी नजर फरमाइयेः-
    उग्रवाद
    मै ठिठक कर रुक गया
    मंदिर के आहाते में
    आज फिर एक लाश मिली थी तमाशबीन
    लाश के चारों ओर खडे थे नजदीक ही कुछ
    पुलिसवाले भी खडे थे उत्सुकतावश मै भी शामिल हो गया तमाशवीनों में
    देखा कटे हाथों वाली वह लाश औधे मुॅह पडी थी
    नजदीक ही उसके कटे हाथ पडे थे जिसकी मुट्ठियॉ
    अभी तक भिंची थी न मालूम क्रोध से अथवा विरोध से
    भीड का एक आदमी चिल्ला चिल्लाकर बता रहा था
    आज दूसरा दिन हुआ है
    मंदिर को खुले और
    हिंसा फिर होने लगी है
    मुझे उसकी बात पर हॅसी सी आयी
    तभी पुलिसवाले ने मेरी तरफ निगाह घुमायी
    और बोला मिस्टर! तुम जानते थे इसे?
    मैने कहा- जी नहीं,
    तभी दूसरे ने लाश को
    पलट दिया
    लाश का चेहरा देखते ही मै सकपका गया
    खून से लिपटी
    कटे हाथों वाली वह लाश
    किसी और की नहीं मेरी अपनी ही तो थी?

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  3. सटीक लिखा है आपने! ज़बरदस्त व्यंग्य !

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  4. bahut teekha vyang samvedan sheel rachna.

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  5. बहुत ही सटीक और कटु सत्य...बहुत मर्मस्पर्शी ...सदैव की तरह एक उत्कृष्ट प्रस्तुति...

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  6. बहुत मार्मिकता से भरी होती हैं आपकी पोस्ट............कहीं बहुत गहरा आक्रोश दबा दिखता है जो कहीं न कहीं झलकता है आपकी पोस्ट में और यही आक्रोश आपको भीड़ से अलग खड़ा करता है..........मुझे बहुत पसंद आई ये पोस्ट..........हैट्स ऑफ इसके लिए|

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  7. bilkul sahi sarthak rachna ....

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  8. बहुत गंभीर और चोट करती कविता!

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  9. मेरी साँसों का
    सफल प्रत्यारोपण
    उन हाथों के अनुरूप
    करना है मुझे
    अपना परिवर्तन
    अन्यथा मुझे
    डूबा दिया जाएगा
    किसी सैलाब में
    लाश बनकर
    तैरने के लिए.ek dam steek panktiya...

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  10. बहुत बढ़िया....कुछ ऐसा जो आमतौर पर पढ़ने नहीं मिला करता..। मेरे पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं ।.बधाई ।

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  11. एक कटु यथार्थ को शब्दों में ढाला है आपने।

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  12. सुन्दर प्रस्तुति, सार्थक, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

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  13. कटु सत्य |
    आशा

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  14. ekdam yatharth ko batati prastuti.....

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  15. एक कटु सत्य को पेश लिया है आपने ...

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  16. लाश थी इसलिए तैरती रह गयी
    डूबने के लिए जिंदगी चाहिए।

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  17. मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  18. बहुत ही सटीक और कटु सत्य| धन्यवाद|

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  19. गहन भावयुक्त अच्छी कविता।

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  20. भयंकर यथार्थ !!

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