Tuesday, January 17, 2012

मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा


मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
उन अव्यक्त कविताओं /कहानियों की
जो हरपल स्त्रियों से फूटती रहती है
उसकी हर चाह से , हर आह से
जिसे शब्द देने की कोशिश में
लगा देती है वह अपना जीवन
व बन जाती है केवल - एक पात्र
जिसपर लिखी जाती रहती है
दर्दनाक कवितायें,किस्से/कहानियाँ
कामुक ,उत्तेजक, रहस्यपूर्ण ,रोमांचक
बाज़ार की मांग के हिसाब से
लिखने वाले उसे ले जाते हैं
किसी भी मंच पर नुमाईश के लिए
उसे खड़ा कर देते हैं - कतार में
छोटे-बड़े पुरस्कार के लिए
अपनी अजीबो-गरीब मानसिकता का
लबादा ओढ़कर उसे नग्न करते हुए
और वह बन जाती है
केवल एक मुद्दा -विमर्श योग्य
मैं लिखना चाहती हूँ - समीक्षा
जो स्त्रियों से अव्यक्त होती है ,
जिसे  उन्हीं के समान बना दिया जाता है
जटिलता की संज्ञा देकर - जटिल
उनके प्रश्न जैसे उत्तर की तरह
और उत्तर से प्रश्नों की तरह
उनकी उठती हर चाहत से
वे ही क्यों होती हैं आहत ?
जब पूरी नहीं होती उनकी चाहत तो
क्यों पूरी होती है औरों की चाहत ?
ऐसा भी नहीं कि उनकी चाहत
गूंगी-बहरी होती हैं ,बल्कि
वह चीख-चीख कर मांगती हैं
अपना वाजिब हक़ जो मिलता नहीं
जो विकृत सामंतवादी मानसिकता से
आखिर , लड़ते-लड़ते
हारती-जीतती तो हैं लेकिन तबतक
सुखांत -दुखांत  वाला पृष्ठ
उस का समाप्ति लिख रहा होता है .


Sunday, January 8, 2012

बदरंग


क्या मैं एक खुबसूरत डायरी हूँ
जिसके कोरे पन्ने पर
कोई भी लिख देता है
अपना कच्चा-पक्का चिट्ठा
और मैं बन जाती हूँ
इस काल की मौन गवाह...
क्या मैं एक फोटो फ्रेम हूँ
जिसमें कस दिया जाता है
जबरन कोई भी तस्वीर
पाषाणयुगीन , मध्ययुगीन
या आज के युग का घिनौना सा
जिसमें वे तमाम बातें होती हैं
जिन्हें नहीं होना चाहिए था...
क्या मैं शतरंज की बिछी बिसात हूँ
ताजपोशी के लिए जिसपर
हमेशा  होती रहती हैं
बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ
मर-कट जाते हैं हजारों-लाखों
और मैं शर्म से हुई रहती हूँ
सुर्ख लाल...
क्या मैं अपने आसमान में उड़ती
अकेली तितली हूँ जो
अपने ही मुरझाये फूलों का
पराग चूस-चूस कर
मान लेती हूँ कि
सारे शोख व चटक रंग
मुझमें ही है और
मैं खुद को ही दिखने लगती हूँ-
बदरंग .