बड़ी सफाई से
अपनी वास्तविकता से
नजरें चुरा कर
दिन-रात युक्तियाँ लगाकर
भीषण दुराग्रहों के बीच भी
नहीं जान पाती हैं - स्त्रियाँ
मौन या मुखर
अस्वीकृतियों का राज़
जो उसके प्रति वक़्त-बेवक्त
दिखाया जाता है - जानबूझकर
जबकि पारिवारिक दंगे-फ़साद की
सबसे कोमल और आसान लक्ष्य
वही बनायी जाती है
हरवक्त सुनना पड़ता है - स्त्रियों को
हवा में तैरते फुंकार को
सोखना पड़ता है विष - सांसों से
अमृत बाहर करना पड़ता है
वह उलझती रहती है
नित नई बनती
षड्यंत्रों के मकड़जाल में
और महसूसती है - विशेष अपनापन
हर बार उत्साह से भरकर
देती है हर उस परीक्षा को
जिसका फल उसे पता होता है
कि उसकी दुर्बलता को
आँका जाएगा - शून्य से
और तो और
अपने अटपटे अधूरेपन में भी
बनाती रहती है बेहतर जगह -
पूर्णता के लिए
फिर तय की गयी भंगिमाओं से
भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को
जीवंत करके
गढ़ती रहती है - परिभाषाएँ
सुखी परिवार की
जो बड़ी सफाई से उसी के लिए
बन जाता है - अर्थहीन .
तीता सा कड़वा सच... मगर है तो सच.... बहुत सुन्दर....
ReplyDeleteहरवक्त सुनना पड़ता है - स्त्रियों को
ReplyDeleteहवा में तैरते फुंकार को
सोखना पड़ता है विष - सांसों से
अमृत बाहर करना पड़ता है
....एक कटु सत्य...बहुत सशक्त प्रस्तुति...
बहुत सही।
ReplyDeleteसादर
फिर तय की गयी भंगिमाओं से
ReplyDeleteभिन्न-भिन्न भूमिकाओं को
जीवंत करके
गढ़ती रहती है - परिभाषाएँ
सुखी परिवार की
जो बड़ी सफाई से उसी के लिए
बन जाता है - अर्थहीन .no words to say.
अर्थहीन को भी अर्थपूर्ण बनाना सच में
ReplyDeleteस्त्रियों को ही साध्य है !
जो बड़ी सफाई से उसी के लिए
ReplyDeleteबन जाता है - अर्थहीन .
सही कहा तभी तो इसके उलट मैने कहा है आज की रचना मे एक जवाब है ………आखिर कब तक सांस ना ली जाये
sach visham se visham parathityio mein jeeti naari ke dukh ka koi ant nahi....sabkuch samarpit bhawana se kar gujarne wali estri hi sabka jiwan sadhti chali jaati hain..
ReplyDeletebahut hi sundar rachna..
satya ko darshati prabhavi rachna
ReplyDeleteकटु सत्य को उजागर करती सशक्त रचना...
ReplyDeleteसादर.
स्त्री के दो रूप एक ही परिवार मे दिखाई देंगे- परिवार को उलझाने और सुलझाने में!!!!!!
ReplyDeleteआपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज charchamanch.blogspot.com par है |
Deleteनारी का संघर्षमय जीवन उसे अर्थ हीन तक पहुंचा देता है ..सशक्त रचना
ReplyDeleteइमरान अंसारी (عمران انصاری)
ReplyDeleteबहुत तीखा और गहन......पर मुझे लगता है की इसकी प्रष्ठभूमि टीवी सीरियलों में दिखाए जाने वाले षड्यंत्रों और अग्निपरीक्षाओं से है :-)
एक पोस्ट की तरह यह बहुत ही उम्दा और शानदार है......भाषा की पकड़ शानदार है.....शब्दों का सुन्दर प्रयोग है.....तीव्रता भी है पर वही बात ये तस्वीर का सिर्फ एक रूख दिखाती है इसलिए कुछ अधूरी सी है.....इस वैमनस्य और कटुता के आस-पास कहीं गहन प्रेम भी है जो स्त्री अपने परिवार से पाती है और उसी नाज़ुक धागे की डोर से वह ये समुन्दर भी पार करती है |
इमरान जी, तस्वीर के दूसरे रुख पर भी जरुर लिखना चाहूंगी , या आपसे उम्मीद करूँ कि आप अपनी कलम चलायें . अच्छा रहेगा |आपका आभार |
Deleteकटु सत्य की बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति,
ReplyDeleteकटु सत्य पर यही सत्य है..सार्थक रचना..
ReplyDeleteजीवन का सत्य भी यही है. सुंदर प्रस्तुति.
ReplyDeleteये विडम्बना है समाज की ... पुरुष वर्ग नारी को बस दबाने और अपने अधीन रखने में विश्वास रखता है ...
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति.
ReplyDeleteकटु सत्य को मर्मस्पर्शी शब्दों से उजागर करती विशिष्ट कविता।
ReplyDeleteबुने गए भ्रम के जाले में वे सबकुछ जानते हुए रहती हैं ... समाज के कई नियमों में उन्हें यही रास आता है
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति....कटु सत्य को उजागर करती सशक्त रचना
ReplyDeleteनारियों की व्यथा आपके शब्दों में मुखरित हो गई है।
ReplyDeletegap is too long.Please put ur poems regularly.someone awaits eagerly.these poems are needed to awaken our society.
ReplyDeleteये भी होता है। स्पष्ट अभिव्यक्ति! होली की शुभकामनायें!
ReplyDeleteअर्थहीन ! सचमुच!
ReplyDeleteकृपया अपना भी अर्थ बता देते !
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