Friday, April 6, 2012

औकात


तुम्हारे भेदभाव पूर्ण नीतियों से
अविश्वास को मिल रहा है बढ़ावा
सवाल उठना तो लाजिमी है
पर तुम्हारी दमनकारी रवैया ने
सवाल को ही पीट-पीट कर
किया है लहुलुहान

फिर आरोपों की बौछार ने
संतुलन को किया है डाँवाडोल
उलटे परामर्श देते हो
रिश्ते को पारदर्शी बनाने का
और अपनी सोच में समीक्षा कर
बढ़ा लेते हो अपनी अपेक्षा

वैधानिक अधिकारों का हवाला देकर
अति कुशलता के सिद्धांतों को
लागू करते हो हम पर
साथ ही बड़ी ढिठाई से
हमें मुक्त करते हो सेवा कर से
तिस पर भी हमें उचित न ठहराना
तुम्हारी दीनता का ही प्रमाण है

तुम क्यों भूलते हो कि
गठजोड़ की राजनीति
समीकरणों से चलती है
मौजूदा हक़ीकत के हिसाब से
पल-पल बदलती है
और संवाद हीनता से बिगड़ती है
न कि अधिकारों को चुनौती देकर
या एकतरफा फैसला लेकर चलती है

एक बात तो साफ़ है
जिसे बस बताने की जरुरत है
कि विकास की अन्धी लहर ने
खोल दी है आँखें हमारी
अब दिन लद गये हैं
दबदबे वाली तुम्हारी

ऐसी बात ना ही करो
जिससे बिगड़े कोई भी बात
और दिखाना न पड़े हमें भी
अपनी या तुम्हारी औकात .