Friday, April 6, 2012

औकात


तुम्हारे भेदभाव पूर्ण नीतियों से
अविश्वास को मिल रहा है बढ़ावा
सवाल उठना तो लाजिमी है
पर तुम्हारी दमनकारी रवैया ने
सवाल को ही पीट-पीट कर
किया है लहुलुहान

फिर आरोपों की बौछार ने
संतुलन को किया है डाँवाडोल
उलटे परामर्श देते हो
रिश्ते को पारदर्शी बनाने का
और अपनी सोच में समीक्षा कर
बढ़ा लेते हो अपनी अपेक्षा

वैधानिक अधिकारों का हवाला देकर
अति कुशलता के सिद्धांतों को
लागू करते हो हम पर
साथ ही बड़ी ढिठाई से
हमें मुक्त करते हो सेवा कर से
तिस पर भी हमें उचित न ठहराना
तुम्हारी दीनता का ही प्रमाण है

तुम क्यों भूलते हो कि
गठजोड़ की राजनीति
समीकरणों से चलती है
मौजूदा हक़ीकत के हिसाब से
पल-पल बदलती है
और संवाद हीनता से बिगड़ती है
न कि अधिकारों को चुनौती देकर
या एकतरफा फैसला लेकर चलती है

एक बात तो साफ़ है
जिसे बस बताने की जरुरत है
कि विकास की अन्धी लहर ने
खोल दी है आँखें हमारी
अब दिन लद गये हैं
दबदबे वाली तुम्हारी

ऐसी बात ना ही करो
जिससे बिगड़े कोई भी बात
और दिखाना न पड़े हमें भी
अपनी या तुम्हारी औकात .


 

20 comments:

  1. बेहद खूबसूरत रचना

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  3. बहुत दिनों बाद आपकी उपस्थिती दर्ज़ हुई ...बढ़िया तेवर हैं रचना के ...

    ReplyDelete
  4. वैधानिक अधिकारों का हवाला देकर
    अति कुशलता के सिद्धांतों को
    लागू करते हो हम पर
    साथ ही बड़ी ढिठाई से
    हमें मुक्त करते हो सेवा कर से
    तिस पर भी हमें उचित न ठहराना
    तुम्हारी दीनता का ही प्रमाण है.... bilkul

    ReplyDelete
  5. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन says -

    :)

    ReplyDelete
  6. संगीता स्वरुप ( गीत )says -


    बहुत दिनों बाद आपकी उपस्थिती दर्ज़ हुई ...बढ़िया तेवर हैं रचना के ...

    ReplyDelete
  7. धन्यवाद , आने के लिए कोशिश करुँगी कि अपनी नियमित उपस्थिति दर्ज कराऊं |

    ReplyDelete
  8. आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !

    ReplyDelete
  9. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    ....... रचना के लिए बधाई स्वीकारें....!!!

    ReplyDelete
  10. कल 09/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  11. बहुत बढ़िया रचना है व्यवहार वादी राजनीति की सीमाओं और संभावनों को रेखांकित करती सी .

    ReplyDelete
  12. अरसे बाद पुनर -अवतरण हुआ है मोहतरमा का .अच्छा लगा आपका यह अवतार .

    ReplyDelete
  13. वाह....वाह .......बहुत ही सुन्दर।

    ReplyDelete
  14. पुरुष में अपना अहं तो होता ही है । कभी-कभी यह अहं बिल्कुल दूसरे छोर पर जाकर दीनता का रूप भी ले लेता है।

    ReplyDelete
  15. post new poems.why you are so silent.our society needs such mirror to view the face and tortures given to half population in india.At least women must stand against it.

    ReplyDelete
  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति....

    ReplyDelete