Sunday, December 15, 2013

मंजूर है !

सुलगती हूँ मैं
तो क्यूँ भर आती है
आँखें तुम्हारी ?
क्यों बैठे हो तुम
हवा और पानी पर
कुंडली मारे ?
या तो जीने लायक
मुझे हवा दे दो
या डाल दो
मुझपर पानी

मैंने प्यार किया है
सिर्फ तुमसे
इसलिए जलना भी
मंजूर है
बुझ जाना भी
मंजूर है
या फिर
तुम्हारी आँखों में
भरकर यूँ ही
सुलगते रहना
मंजूर है
मंजूर है
मंजूर है . 

6 comments:

  1. फिर मैं प्रकट हुई माफ़ी के साथ .

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    1. Kya aap MeriRai.com ke liye likhna pasand karengi?

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  2. यक़ीन जानिए आपके ब्लॉग को अपडेट देख बहुत ख़ुशी हुई । आप बेहतरीन लिखती हैं कोशिश कीजिये कि नियमित हो सके |

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  3. बहुत दिनों बाद ... पर संवेदनशील लिखा है ...
    ये प्रेम है पर घुटा हुआ .. जो न जीने देता है न मरने ...

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  4. हवा पानी प्रकाश पर इसलिए कब्ज़ा किये बैठे रहते है
    कि कही स्वतंत्र सोच पाकर वह विद्रोह न कर दे !
    बढ़िया रचना, बहुत दिनों के बाद आपको ब्लॉग पर पुन; सक्रीय
    पाकर अच्छा लगा !

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